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पहले कुत्ता काटे फिर इंजेक्शन!

ुत्ता काटने के इलाा के नाम पर राय के सरकारी अस्पतालों को प्रयोगशाला और मरीाों को ‘गिनी पिग’ के रूप में इस्तेमाल कियाोा रहा है। वीरोरब और रैबीपुर ौसे इंोक्शन बने हैं माँसपेशियों में लगाने के लिए लेकिन ये इंोक्शन मरीा की त्वचा में लगाएोा रहे हैं।ोबकि इंोक्शनों के लेबल पर साफ तौर पर इन्हें ‘इन्ट्रा मस्कुलर’ विधि से लगाने की ही सलाह दी गई है।ड्ढr राय में 2004 तक एक सामान्य वैक्सीन प्रचलित थी। किसी को कुत्ता काटता था तो उसे नाभि के पास यह वैक्सीन लगाईोाती थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस वैक्सीन पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने मरीाों को वैक्सीरब, वीरोरब और रैबीपुर ौसी ‘सेल कल्चर वैक्सीन’ लगानी शुरू कर दी। बार में इन इंोक्शनों की कीमत 350 रुपए प्रति वायल तक है। इन इंोक्शनों को ‘इन्ट्रा मस्कुलर’ विधि यानी माँसपेशियों केोरिए मरीा को लगायाोाता है। यह एक बार में एक मरीा को पूरा लगता है। पिछले साल सीएमएसडी ने वीरोरब और रैबीपुर के 4-4 लाख इंोक्शन खरीद लिए। इंोक्शन कम पड़े तो बिना टेंडर के रैबीपुर के और वायल खरीद लिए गए। ये सभी ‘इन्ट्रा मस्कुलर’ थे।ड्ढr सरकारी अस्पतालों में 1मई, 2006 से नया प्रयोग शुरू हुआ।ोो इंोक्शन इन्ट्रा मस्कुलर विधि से लगड्डाने के लिए खरीदे गए थे उन्हें इन्ट्रा डरमल विधि यानी त्वचा के माध्यम से लगायाोाने लगा। इस नए तरीके से एक इंोक्शन से चार मरीाों का इलाा होने लगा।ड्ढr यही नहीं संयुक्त निदेशक एसएचआई डॉ. एमएन सिद्दीकी के नेतृत्व में बलरामपुर अस्पताल में इन्ट्रा मस्कुलर इंोक्शन को इन्ट्रा डरमल विधि से लगाने की बकायदा ट्रेनिंग दी गई। कई डॉक्टरों ने ऐतरााोताया और पूछा कि कोई ‘साइड इफेक्ट’ या ‘रिएक्शन’ हुआ तो कौनोिम्मेदार होगा ?ोवाब में 24 अप्रैल 2007 को इस नए प्रयोग के पक्ष में एक शासनादेशोारी कर दिया गया।ड्ढr ‘हिन्दुस्तान’ नेोब इस बार में निदेशक सीएमएसडी डॉ. एपी गुप्ता से पूछा तो उनका कहना था कि इस साल भ्रम खत्म करने के लिए 3 लाख इन्ट्राडरमल और 3 लाख ‘इन्ट्रामस्कुलर’ वैक्सीन मँगाई हैं।ड्ढr ये ठीक नहीं : विशेषज्ञ -पेा 2ड्डड्ड

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