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दो कैडरों की लड़ाई उलझन में सरकार

झारखंड सरकार दो कैडरों की लड़ाई में उलझ गयी है। सचिवालय सहायक 20 दिन से हड़ताल पर हैं। सरकार का कामकाज पूरी तरह ठप है। फिर भी हड़ताल समाप्त कराने की दिशा में ठोस पहल नहीं हो रही है। हड़तालियों की मानें, तो उनके आंदोलन में सरकार नहीं, स्टेट कैडर के अधिकारी बाधक बने हुए हैं। इस कैडर के अधिकारी नहीं चाहते कि सचिवालय सेवा का गठन हो। सहायक संवर्ग केंद्र के अनुरूप सचिवालय सेवा के गठन की मांग कर रहे हैं। इससे इनके प्रोमोशन का रास्ता खुलेगा। स्टेट कैडर को यही बात नहीं जंच रही है। इससे उनकी कुर्सी खतर में पड़ जायेगी। सचिवालय में स्टेट कैडर की मूल कोटि का एक भी पद नहीं है। बावजूद इसके, अवर से संयुक्त सचिव तक के अधिकतर पदों पर इसी कैडर के अधिकारी पदस्थापित हैं। स्टेट कैडर के अधिकारी मंत्रियों एवं आइएएस अधिकारियों का कान भर रहे हैं कि हड़तालियों की मांगें मान लेने से सरकार पर वित्तीय भार बढ़ेगा, जबकि ऐसा कुछ नहीं है। सचिवालय के अधिकांश सहायक पहले से ही ग्रुप ‘बी ’का वेतनमान ले रहे हैं। सचिवालय सेवा का गठन होने से उन्हें सिर्फ प्रोमोशन का लाभ मिलेगा। इनके प्रोमोशन से सरकार पर अधिकतम 11 लाख रुपये का वित्तीय भार पड़ेगा। यदि स्टेट कैडर को सरकारी खजाने की इतनी ही चिंता है, तो उन्हें अपने वेतन पुनरीक्षण के समय भी इस पर विचार करना चाहिए था। झारखंड संभवत: देश का पहला राज्य है, जहां स्टेट कैडर के अधिकारी ग्रुप ‘ए ’ का वेतनमान ले रहे हैं। इस ग्रुप में आइएएस-आइपीएस आते हैं।ड्ढr सरकार भी इस बात को अच्छी तरह समझ रही है। उलझन यह है कि कहीं एक को मनाने में दूसरा न बिदक जाये। वैसे सचिवालय सेवा गठन के संबंध में सरकार पहले ही संकल्प ले चुकी है। आंदोलनकारी इसी को अपना आधार बनाये हुए हैं।

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