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संत गरीबदास

संत गरीबदास, संतों के भक्त और सत्यनाम की भक्ित गंगा प्रवाहित करने वालों में अग्रणी महात्मा माने गए हैं। वह कबीर के दर्शन से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने अपने समय की जनता को साधु-संतों का अनुसरण करना, उनका सत्संग करना, सत्यनाम की निगरुणधारा की भक्ित गंगा में स्नान करना सिखाया और इस प्रकार सर्वत्र ‘सत्य’ की व्याप्त-सत्ता का उद्घोष किया:ड्ढr राम कहै मेर साधु को, दुख मत दीज कोया।ड्ढr साधु दुखावै मैं दुखी, मेरा आपा भी दुख होया।।ड्ढr संत गरीबदास ने कहा कि प्राणिमात्र का परम कर्तव्य भगवान का चिंतन ही है। यह जीवन परमात्मा के भजन के लिए मिला है- उसका दुरुपयोग माया-मोह में कभी नहीं करना चाहिए। सदा सत्य का आचरण करना चाहिए। गरीबदास का जन्म एक जाट परिवार में हुआ था। बचपन से ही वह खोए-खोए से रहते थे। साधु-संतों का मिलन उन्हें आनंद देता था। कहते हैं जब वह बारह वर्ष के थे तो संत करीब ने उन्हें दर्शन दिए थे। संत गरीबदास ने कहा भी है:ड्ढr ऐसा सतगुरु हम मिला, तेजपुंज के अंग।ड्ढr झिलमिल नूर जहूर है, रूपरख नहि रंग।। गरीबदास ने कहा- ‘शब्द’ गुरु है, चित्त चेला है। हमें ऐसे सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए जो ‘शब्द’ में समा गया हो। भवसागर में डूबने से केवल सद्गुरु की कृपा ही बचा सकती है। कबीर के प्रति उन्होंने कहा- ‘दास गरीब कबीर का चेरा, सत्त लोक अमरापुर डेरा।’ वे आजीवन गृहस्थ वेश में रहे। वह भगवान का भजन और चिंतन करने में लीन रहते। इसीलिए कहा गया है कि संत गरीबदास में भक्त और संत का अद्भुत समन्वय था। वह जनता को भजन और सत्संग में लीन रहकर परमात्मा की साधना करने का उपदेश देते थे। उन्होंने कहा कि सूरत, निरत, मन और पवन के द्वारा ही शिव तत्व की कृपा से चौदहों भुवन दीख पड़ते हैं। गरीबदास राम-नाम का जाप करने को कहते थे। यही कारण था कि वह नाम मार्गी संत कहलाए।

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  • Web Title: संत गरीबदास