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सार्क : नौ दिन चले अढ़ाई कोस

दक्षेस अभिशप्त आंदोलन बन गया है। हालांकि कोलम्बो सम्मेलन में आतंकवाद को एक सामूहिक खतर के रूप में स्वीकारा गया है लेकिन पाकिस्तानी रवैए से यह कोलम्बो प्रस्ताव विफल हो जाए तो कोई अचरा नहीं। विभिन्न सम्मेलनों में पारित कई अच्छे प्रस्ताव आज भी वास्तविक अमल की प्रतीक्षा कर रहे हैं। साप्टा से लेकर साफ्टा तक सब फेल हो गए हैं। सदस्य देशों में परस्पर अविश्वास की खाई इतनी गहरी हो गई है कि वे किसी मुद्दे पर एकमत हो ही नहीं सकते। ऊपर से आतंकवाद का पाक संदर्भ तो बिल्ली को दूध की रखवाली वाली बात हो गई।ड्ढr हर्ष वर्धन कुमार, गांधी विहार, दिल्ली पाक की बदनीयती को पहचानें यदि आप धूर्तता का मूर्त रूप देखना चाहते हैं तो पाक को देख लें। पाक ने जिस बेशर्मी से भारत को अस्थिर करने की मुहिम सी चला रखी है उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि वह बाज आने वाला नहीं है। सूरत में मिले दर्जनों जीवित बमों ने तो हमारी सांसें ही रोक दी हैं। ये पाक प्रशिक्षित तथा वहीं से संचालित आतंकवादी आए दिन विस्फोटों की धमकियां भी दे रहे हैं। यह तो छद्म युद्ध का रूप है पर खुले तौर पर भी पाक सीमा पर न केवल घुसपैठ कर रहा है, बल्कि भारी हथियारों से सीमा पर हमला कर सीजफायर का उल्लंघन भी कर रहा है। वक्त आ गया है कि भारत को आतंकी घटनाओं से निपटने के लिए नए तेज व सख्त कानून तथा नई अदालतों का गठन किया जाना चाहिए।ड्ढr इन्द्र सिंह धिगान, किंगवे कैम्प, दिल्ली बाजारवाद और छात्र राजनीति बाजारवाद ने देश की छात्र राजनीति पर भी अपना रंग जमा लिया है। इसकी एक बानगी दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में देखी जा सकती है, जहां हर साल सितम्बर महीने में छात्र संघ और कॉलेज यूनियनों के चुनाव होते हैं। सत्तर के दशक तक दिल्ली विश्वविद्यालय में काफी कुछ सार्थक छात्र राजनीति चलती रही है। लेकिन अब वैसा नहीं है। गांधीवादी और समाजवादी छात्र राजनीति का दाना-पानी उठ चुका है। निकट भविष्य में उसके उभरने की कोई संभावना भी नजर नहीं आती। इस स्थिति में मेधावी छात्रों को जगाकर ही छात्र राजनीति की दिशा बदली जा सकती है।ड्ढr नीरा कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय 2006 की कीमतें दो एक गहरी साजिश के तहत छठे वेतन आयोग की लगातार हवा निकलती नजर आ रही है। नेताओं और नौकरशाहों ने किस कदर दो वर्ष पूर्व सिर्फ आधा घंटे में अपने वेतन और भत्ते छ: गुणा से भी अधिक बढ़ा लिए और देश की मेहनतकश जनता को बार-बार खाली खजाने के दर्शन कराने पर तुले हैं। जनवरी 2006 से ठीक हिसाब से देय वेतन पर भी दुल्हन की तरह नखर क्यों किए जा रहे हैं? यदि सरकार ठीक से इसे नहीं देना चाहती तो जनता का 2006 की कीमतें देकर अपने को दूध का धुला साबित करके तो दिखाए। वरना यह नाटक ज्यादा चलने वाला नहीं है।ड्ढr वेद मामूरपुर, नरला, दिल्ली आत्मनिर्भर बनें महिलाएं महिलाओं का आत्मनिर्भर होना पुरुषों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसलिए इसमें कई रोड़े अटकाये जाते हैं। समाज में पुरुषों के आधिपत्य को चुनौती देना है तो महिलाओं को आत्मनिर्भर बनना होगा।ड्ढr परमजीत कौर, सेक्टर 6, चंडीगढ़

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