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सबसिडी का बोझ

ाब महंगाई आसमान छू रही हो और चुनाव सिर पर खड़े हों तब कोई भी सरकार आर्थिक सुधारों से जुड़े कड़वे फैसलों को ठंडे बस्ते में डाल देती है। तेल कम्पनियों की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए गठित बी. के. चतुव्रेदी समिति की सिफारिशों पर यदि मनमोहन सिंह सरकार कुंडली मारकर बैठ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस समिति ने लगभग वही सब सुझाव दोहराए हैं जो दो वर्ष पहले रंगराजन समिति ने दिए थे। रंगराजन समिति को सूरा की रोशनी नसीब नहीं हुई। चतुव्रेदी समिति की सिफारिशों का हश्र क्या होगा, राम जाने। सिफारिशों में पेट्रोल, डीाल, रसोई गैस तथा मिट्टी के तेल की कीमतों को अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव से बांधने की बात कही गई है, जो एक आदर्श स्थिति है, किन्तु हमार यहां आदशरें का स्थान पुस्तकों तक सीमित है। जमीनी राजनीति से जुड़े लोग आर्थिक निर्णय भी वोट की तराजू में तोलकर करते हैं। भले ही भारी सबसिडी प्राप्त मिट्टी का तेल काला बाजार में बिक जाए, खेती के नाम पर सस्ते डीाल से मर्सडीा कार चलें और आम आदमी के उपयोग वाले गैस सिलेंडर होटलों व रस्टोरंट में इस्तेमाल हो, सरकार सुधार के लिए पहल नहीं करती। चतुव्रेदी समिति ने 11 महानगरों में डीाल दो रुपए प्रति लीटर करने, उद्योगों व रलवे को बाजार मूल्य पर डीाल देने की सिफारिश की है जिसे स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं दिखता। चतुव्रेदी समिति की सिफारिशों पर सार्वजनिक बहस छेड़ी जानी चाहिए, किन्तु केन्द्र सरकार शायद इसके लिए भी तैयार नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें कम हो रही हैं और सरकार को उम्मीद है कि यदि मूल्य गिरकर 70 रुपए प्रति बैरल पर आ गए तब सबसिडी के झंझट से स्वत: मुक्ित मिल जाएगी। सुनहर भविष्य की कल्पना में आज के कड़वे सच की उपेक्षा करना बुद्धिमानी नहीं मानी जाएगी? तेल उत्पादों के दाम बांधे रखने से सार्वजनिक तेल कम्पनियां लहू-लुहान हैं अकेले इंडियन आयल को प्रतिदिन 330 करोड़ रुपए का घाटा उठाना पड़ रहा है। इन कम्पनियों को दिलासा देने के लिए पिछले तीन साल में सरकार ने लगभग सत्तर खरब रुपए के तेल बांड जारी किए हैं। सस्ते पेट्रोलियम उत्पाद मुहैया करने के लिए भावी पीढ़ियों पर र्का का बोझ लादना अनैतिक ही है। जब देश को अपनी जरूरत का लगभग 70 प्रतिशत पेट्रोलियम आयात करना पड़ता हो तब एक स्पष्ट नीति का होना निहायत जरूरी है।

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  • Web Title: सबसिडी का बोझ