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मियां-बीवी राजी ..

योजना आयोग की सदस्य डॉ. सैयदा हमीद ने एक निकाह में काजी की भूमिका निभाकर नया इतिहास बनाया है, साथ ही कुछ पुराने भ्रम भी तोड़े हैं। एक भ्रम तो यह है कि समाज, खास तौर पर मुस्लिम समाज परिवर्तन के लिए तैयार नहीं है। यह भ्रम समाज के दकियानूसी लोग फैलाते हैं और अक्सर पढ़े-लिखे लोग भी इसे स्वीकार कर लेते हैं। हकीकत यह है कि कट्टरपंथी दकियानूसी लोग ही समाज में गलत किस्म के परिवर्तन लाते हुए दिखते हैं। तमाम धर्मो में जो शुद्धतावादी, कट्टरपंथी रुझान लाने की कोशिश इन दिनों हो रही है और धर्मो की सहिष्णुता और सहअस्तित्व की परंपराओं को तोड़ा जा रहा है, वह इन कट्टरपंथियों के जरिए लाए गए तत्व हैं। इसलिए धर्म और समाज में प्रगतिशीलता और बराबरी के मूल्यों को स्थापित करने वाले परिवर्तन आते हैं तो वे स्वागतयोग्य हैं। अगर कहीं कट्टरवादी और संकीर्ण तत्व मजबूत होते दिखते हैं तो इसकी वजह यह है कि प्रगतिशील तत्वों ने अपनी बात मजबूती से रखने की कोशिश नहीं की। लेकिन आधुनिकता का सहा रुझान प्रगतिशीलता की ओर है इसलिए समाज में ऐसे परिवर्तन लाए जा सकते हैं। मुस्लिम समाज में एक महिला निकाह पढ़वा सकती है तो इसकी वजह यह भी है कि कट्टरपंथियों के तमाम विरोध के बावजूद काफी तादाद में महिलाएं पढ़ लिख गई हैं, वे ऊंचे ओहदों पर हैं, समाज में बदलावों से वाकिफ हैं। मध्यकाल में महिलाओं को ऐसे अवसर ही नहीं थे कि वे काजी की भूमिका निभाने की सोच सकें। एक अर्थ में नया इसलिए नहीं है कि यह दरअसल धर्म की मूल प्रस्थापनाओं और मूल्यों की ओर लौटना है। ये पाबंदियों दरअसल धर्म की नहीं सामंती समाज की देन हैं। इस्लाम का आगमन तो एक सामंती और कबीलाई समाज में बराबरी और न्यायपरकता लाने की शुरुआत थी। इस मायने में यह कदम धर्म की रिवायतों से ज्यादा उसकी मूलभावना को महत्व देने की कोशिश है। पिछले सालों में धीर-धीर ऐसे कई सकारात्मक परिवर्तन मुस्लिम समाज में हुए हैं, यह निकाह उम्मीद की एक किरण है, लेकिन खास बात यह है कि यह एकमात्र किरण नहीं है।ं

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  • Web Title: मियां-बीवी राजी ..