अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

तिब्बत : कैसे बढ़ेगी मुक्ित की लड़ाई?

फिलहाल तो ओलंपिक की चकाचौंध में तिब्बत को हम लगभग भूल ही गए हैं। अभी कुछ दिन पहले तक तिब्बत अगर सुर्खियों में था तो सिर्फ इस अटकल के साथ कि कहीं वह ओलंपिक में बाधा तो नहीं बनेगा। हालांकि तिब्बती शरणार्थियों के लिए तिब्बत का सवाल किन्हीं एक-दो ओलंपिक से कहीं ज्यादा बड़ा है। फिलहाल उनकी सबसे बड़ी चिंता यही है कि अब तिब्बत मुक्ित अभियान को आग कैसे बढ़ाया जाए। वह भी तब जब बदलते चीन के आगे दुनिया इस बात को लगभग भूलती सी जा रही है। निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री सामदोंग रिनपोटे ने अक्तूबर 2006 में बोधगया में आयोजित सम्मेलन में मुक्ित संघर्ष के जो मुख्य तीन आयाम बताए थे उनमें पहला यही था कि किसी तरह अंतरराष्ट्री़य स्तर पर मुद्द को बनाए रखा जाए। यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया है एवं दुनिया का ध्यान तिब्बत की समस्याओं की ओर गहराई से आया है, इसलिए अब महत्वपूर्ण प्रश्न इसे बनाए रखन का है। दूसरा प्रमुख प्रश्न ओलंपिक उपरांत चीन की तिब्बत नीति से निपटन का है। तीसरा दलाई लामा के साथ चीन सरकार की बातचीत आरंभ करान का है, ताकि तिब्बत समस्या के स्थायी हल का रास्ता निकल सके। क्या भारत भूमि से इन तीनों लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान दिया जा सकता है? जब ओलंपिक मशाल के कारण तिब्बत का सवाल सुर्खियों में था, तो दलाई लामा के प्रतिनिधियों और चीन सरकार के प्रतिनिधियों के बीच सातवें दौर की बातचीत आरंभ हुई। किंतु इसमें ऐसा कोई परिणाम नहीं आया जिसे उल्लेखनीय माना जा सके। 10 मार्च को तिब्बत में आरंभ विरोध प्रदर्शनों के बाद चीन ने दलाई लामा को राक्षस और शैतान का हृदय रखने वाला तक कह दिया था। इस पृष्ठभूमि में उसका बिना शर्त बातचीत करना महत्वपूर्ण है। लेकिन यह भी उसकी ओलंपिक आयोजन रणनीति का अंग हो सकता है, ताकि वह विश्व समुदाय को बता सके कि देखिए आपके अनुरोधों के अनुसार हम बातचीत ता कर रहे हैं। दलाई लामा सहित निर्वासित सरकार भारत में हैं, इसलिए भारत की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत में आम जनता की सहानुभूति तिब्बतियों से जुड़ी है जो समय-समय पर प्रकट भी होती है। उस सहानुभूति को कैसे सक्रिय समर्थन में बदला जाए यह जिम्मेवारी तिब्बत संघर्ष में लगे भारतीय नेताओं की है। लेकिन तिब्बत संघर्ष के शीर्ष भारतीय नेताओं के पास संघर्ष की जितनी व्यापक कल्पना या विजन होनी चाहिए उसका अभाव है। इस समय अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान तिब्बत की ओर बनाए रखते हुए चीन पर इतना दबाव बनान की कोशिश करन की आवश्यकता है, ताकि वह ओलंपिक के बाद तिब्बत में फिर से दमन चक्र न चलाएं। और सीधे दलाई लामा से बातचीत करके स्वायत्तता की मांग है उसके बारे में फैसला करे। यह बहुत बड़ा लक्ष्य है। संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसी विश्व संस्थाओं के साथ भारत सरकार की गहन भूमिका के बगैर यह हो ही नहीं सकता। तिब्बत संबंधी बातचीत में भारत के शामिल हुए बगैर कोई रास्ता कैसे निकल सकता है? इसलिए बातचीत की मेज पर दलाई लामा और चीन के साथ भारत सरकार के प्रतिनिधि का बैठना आवश्यक है। यह जन दबाव से ही संभव है और इसके लिए जनता के बीच कार्यक्रम करन के साथ राजनीतिक दलों से संपर्क करके उनको इसके लिए तैयार करना होगा। साम्यवादी दलों को छोड॥कर निजी स्तर पर सभी दलों के नेता तिब्बत की मुक्ित का समर्थन करते हैं। इस बात पर लगभग आम सहमति है कि अतीत में तिब्बत ही हमारा पड़ोसी था चीन नहीं। ये यह भी मानते हैं कि हानवंशी चीनियों ने अपने विस्तारवादी स्वभाव के अनुसार तिब्बत को हड़पा एवं तब से वे हिमालय क्षेत्र की महान सभयता व संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं। इससे भारत की सुरक्षा समस्या तो खैर बढ़ी ही है। यानी तिब्बत की मुक्ित में भारत का अपना हित निहित है। बजट सत्र में संसद के दोनों सदनों में तिब्बत में चीनी दमन के लिए चिंता प्रकट की गई और बहुमत की भावना चीन के खिलाफ तथा तिब्बतियों के पक्ष में थी। लेकिन इन नेताओं के लिए तिब्बत का संघर्ष प्राथमिकता नहीं है। राजनीतिक दलों व नेताओं को संघर्ष का हिस्सा बनाकर तीनोंे लक्ष्य हासिल करन की कोशिश करना उनकी जिम्मेवारी है, जिनकी पहचान तिब्बत संघर्ष से जुड़ी है। यह लक्ष्य तिब्बत के मसले पर केवल गोष्ठियां या सेमिनार में भाषण देने से पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए मैदान में कूदना होगा। साफ है कि तिब्बत मुक्ित अभियान के लक्ष्यों को हासिल करन के लिए ऐसे भारतीयों की आवश्यकता है जो इसे अपना साध्य मानकर कार्य करे।ड्ढr लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: तिब्बत : कैसे बढ़ेगी मुक्ित की लड़ाई?