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जजों की जांच के लिए अलग कानून जरूरी : वर्मा

उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से निपटने की बात तो बहुत होती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इस बार में सरकारों की ढिलाई की वजह से अभी तक कुछ नहीं हुआ है। यहां तक जजेज इंक्वायरी बिल, 2006 भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। न्यायपालिका अपनी तरफ से इस दिशा में कोशिश करती रही है। 7 मई 1ो तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस वर्मा ने उच्च जजों की जांच के लिए अलग से कानून बनाने के लिए सरकार को फुल कोर्ट की सहमति से तीन प्रस्ताव भेजे थे। इनमें पहला प्रस्ताव संपत्ति की घोषणा करना, दूसरा आचार संहिता बनाना तथा तीसरा जांच के लिए आंतरिक प्रक्रिया तय करना था। लेकिन इन पर कोई विचार नहीं हुआ। इसके बाद जस्टिस वर्मा ने फिर एक प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा। जजेज इंक्वायरी बिल, 2006 इसी पत्र के आधार पर बना तो सही, लेकिन उसका हश्र सबको पता है। हिन्दुस्तान से विशेष बातचीत में जस्टिस वर्मा ने कहा कि उच्च जजों की जांच के लिए अलग से कानून होना चाहिए। यदि किसी जज के खिलाफ भ्रष्टाचार के ठोस सबूत हैंऔर उसके खिलाफ अपराध प्रथम दृष्टया सिद्ध होता है तो ऐसे जज की जांच की लिए प्रभावी कानूनी मशीनरी होनी चाहिए। मशीनरी ऐसी हो जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए कानून के दायर में रहकर उस जज की जिम्मेदारी तय कर। साथ ही यह भी ध्यान रखे कि ईमानदार जज के खिलाफ इसका दुरुपयोग न होने पाए। जस्टिस वर्मा ने कहा कि वीरास्वामी केस, 1ाजों की जांच पर पांच जजों का फैसला) में उन्होंने बहुमत के खिलाफ व्यक्त राय में इस बात पर जोर दिया था कि उच्च जजों की जांच के लिए मौजूदा कानून उचित नहीं है। बहुमत की राय भी यही थी कि एफआईआर की अनुमति से पहले यह देख लिया जाए कि दिए गए सबूत सीआरपीसी की धारा 154 (एफआईआर) की जरूरतों को पूरा करते हैं या नहीं। जस्टिस वर्मा ने कहा कि जजों की जांच में किसी जनप्रतिनिधि को नहीं रखना उचित नहीं है। तो क्या इससे पारदिर्शता प्रभावित नहीं होगी। इस सवाल पर जस्टिस वर्मा ने कहा, ‘नहीं। अपने कार्यकाल में उन्होंने तीन जजों के खिलाफ एफआईआर की अनुमति दी थी, लेकिन किसी सरकार ने रिपोर्ट दर्ज नहीं की।’

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  • Web Title: जजों की जांच के लिए अलग कानून जरूरी : वर्मा