अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

स्वतंत्रता माने क्या?

अगस्त के दिन हम जिन बातों पर बहुत बोलते हैं, उक्सर उन पर पूरी गंभीरता से सोचते नहीं: मिसाल के तौर पर स्वतंत्रता या इंडिपेंडेंस के असली मतलब। इंडिपेंडेंस का सीधा अर्थ स्वतंत्रता या स्वाधीनता से लगाते हैं। पर इनमें एक फर्क है, और वह फर्क दो भाषाओं ही नहीं, दो संस्कृतियों के बीच का फर्क भी है। अंग्रेजी का शब्द इंडिपेंडेंस उस संस्कृति की उपज है जो मनुष्य को भौतिक संस्कार का केन्द्रीय बिन्दु और अपनी किस्मत का पूर्ण नियंता मानती है (मैन क्ष द मैार ऑफ ऑल थिंग्स)। इसके असली अर्थ के दर्शन यूरोप में हमको आज भी हर कहीं अचानक मिल जाते हैं। फ्रांस के कहवा घरों से लेकर एल्प्स पर चढ़ते-उतरते अबाल वृद्ध उन सैलानियों तक में, जो सिर्फ एक छोटा पिट्ठू पीठ पर बांधे मुट्ठी भर भोजन लेते हुए प्रकृति की सुषमा का चैन से स्वाद लेते दुर्गम पहाड़ों के बीच कई हफ्ते गुजार सकते हैं।ड्ढr ड्ढr आज के हिन्दुस्तान में हम उत्तर भारत के कुछ शहरों में किए गए सव्रे की रपट छाप रहे हैं। उत्तरदाताओं के बहुमत ने लोकतंत्र को भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि माना है। हमारा यह लोकतंत्र स्वतंत्रता आंदोलन से निकला है। स्वतंत्रता भारतीय सोच से निकला शब्द है, जो पूर भौतिक विश्व को एक निराकार सत्ता के अधीन मानता है। उसी निराकार शक्ित से मनुष्य का स्व भी उपजा है इसलिए पूरी तौर से आजाद व्यक्ित भी उस ‘स्व’ के तंत्र अधीन ही माना जाएगा। भारतीय संस्कृति में पूर्ण स्वतंत्रता मोक्ष की स्थिति में सिर्फ तभी संभव है, जब व्यक्ित भौतिक दुनिया से एकदम अलग- थलग हो जाता है।ड्ढr ड्ढr यानी इस दुनिया में रहते हुए, जीते जी संपूर्ण स्वतंत्रता की परिकल्पना हिन्दुस्तानी मानस के लिए अजनबी ही है। और शायद इसीलिए हिन्दुत्व परम्परावादी लोग अक्सर स्त्रियों या आवरणों की स्वतंत्रता को यथास्थिति के लिए एक अप्राकृतिक चुनौती (उच्छृंखलता का रूप) मानते और उसका विरोध करते हैं। अगर 15 अगस्त देश में सचमुच में एक लोकतांत्रिक राज समाज को मजबूत और स्थिर बनाने पर सोचना हो, तो भले ही वह कितनी ही कष्टकर लगे, स्वतंत्रता की पारंपरिक भारतीय अवधारणा को एक हद तक चुनौती दिए बिना हमारा काम नहीं चल सकता। जो देश आज सच्ची लोकतांत्रिकता की मिसाल हैं उन्होंने भीषण कष्ट सह कर भी व्यक्ित की स्वतंत्रता की ज्योति जलाए रखी है।ड्ढr ड्ढr यह सही है कि मनुष्यों पर गैर लोकतांत्रिक ताकतों ने वहां भीषण अत्याचार किए, लेकिन यह भी सही है कि व्यक्ित के हक और मानवाधिकारों की सबसे सार्थक लड़ाइयां भी वहीं लड़ी गई हैं। हम अपनी ही जाति या धर्म विशेष के मानवाधिकारों तक ही अपने सरोकार सीमित रखें और अपने लिए पूर्ण स्वतंत्रता के मावे मिष्ठान चाहें यह कैसे हो सकता है? जम्मू और घाटी में यही सवाल सुलग रहा है। स्वतंत्रता दिवस मनाते हुए हमको तनिक इस पर भी सोच लेना चाहिए। अन्यथा एक दिन हम भी युधिष्ठिर की तरह कहेंगे की मांस के लोभी कुत्तों की तरह जमीन के एक खंड की लड़ाई में हमने अपने ही लोगों के रक्त से वसुन्धरा को भिगा दिया। इस रक्तस्नात भूमि को लेकर हम क्या करंगे?

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: स्वतंत्रता माने क्या?