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बिरसा के गांव की बिरसी

साल, कोई छोटा अरसा नहीं होता। बुरी नजर वाले चतुर बाहुबली देशों के सामने हम अपना तिरंगा बेखौफ फहराये जा रहे हैं इन छह दशकों से। एटमी करार पर अपनी शर्ते रखना परिचायक है हमारी बढ़ती कूवत का। और, अब तो अभिनव बिंद्रा के ओलंपिक गोल्ड मेडल ने उस दो सौ साल पुराने स्वर्णिम युग के लौटाने की आस भी बंधा दी है। इसलिये खूब धूम से मनेगा यह 15 अगस्त!शहर के चौराहों पर देश भक्ति गीतों वाले लाउडस्पीकर के साथ लहराते पताके। नेताजी का काफिला सायरन बजाता दनदनाता हुआ आगे बढ़ जायेगा। लक्ष्य होगा सरकारी समारोह स्थल, जहां ऊंचाई पर तिरंगे की ओर होंगी सबकी निगाहें। वहां, शान से फहरायेगा तिरंगा, और फूल झडें़गे। वाकई हम गौरवान्वित हैं, और होंगे!लेकिन, रणजीत के चेहर में आज भी वह चमक नहीं। जब से बिरसी से मिलकर लौटा है, अलग-थलग रहता है 22 वर्षीय यह युवा पत्रकार। कुरदने पर जेब से एक तस्वीर निकालकर बढ़ाते हुए कहता है- मेरी खातिर कुछ करना ही चाहते हैं तो आज इस तस्वीर को छपवा दीजिए। चौंककर तस्वीर मैंने ली, देखा. कुछ पूछता, इससे पहले ही रणजीत फूट पड़ा. हां, ‘यह है’ हमार स्वतंत्र भारत की असल तस्वीर! एक चिथड़े में लिपटी अधेड़ बिरसी पककर फटे कटहल के अंतिम हिस्से का कोआ खाने में मशगूल थी। पास खड़ी है, उसकी आठ-नौ साल की बेटी शिवनी। रणजीत ने बताया कि यह तस्वीर उसने अड़की प्रखंड के एक गांव में खींची थी। वही, भगवान बिरसा के गांव ऊलीहातू वाला अड़की प्रखंड। .आप पूछ रहे थे ना, मैं क्या सोच रहा हूं. इन लाल बत्ती वाली दनदनाती गाड़ियों को देख बिरसी का ख्याल आ गया। आज भी वह मां-बेटी तड़के ही घर से निकल गयी होंगी। जंगल की ओर। उनकी भी नजरं ऊपर की ओर कुछ तलाश रही होंगी, लेकिन वह फूल झड़ने वाला तिरंगा हरगिज नहीं। काश ऐसा होता! लेकिन, उनकी निगाहें तो ऊंची दरख्तों में तलाश रही होंगी टपक पड़नेवाला कोई पका जंगली कटहल। काश! झारखंड की यह असली तस्वीर हमार नेता भी देख पाते।ं

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