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गरम जेब का गणित

छठे वेतन आयोग की सिफारिशों में कुछ संशोधन कर केंद्र सरकार के 55 लाख कर्मियों को वेतन व भत्तों में वृद्धि का जो तोहफा दिया गया, उससे उनका खुश होना स्वाभाविक है। पिछले कुछ सालों के दौरान खाने-पीने की चीजें, कपड़े, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं लगातार महंगी हुई हैं। मुद्रास्फीति की मौजूदा 12.44 प्रतिशत दर भी एक संकेत है कि महंगाई से आम जनता त्रस्त है। इसलिए, वेतन-बढ़ोतरी का कदम उन्हें राहत प्रदान करगा। पिछले कुछ सालों के दौरान निजी क्षेत्र में रोगार के बढ़ते अवसरों व बेहतर वेतन के चलते सरकारी नौकरियों का आकर्षण घटा। इससे सरकारी महकमों के कई उच्च पदेन और कुशल कर्मचारी निजी क्षेत्र में चले गए। इसके मद्देनजर भी उन्हें बेहतर पैकेा देना एक तर्कसंगत कदम है। लेकिन, कुछ कड़वी हकीकतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। निकट भविष्य में कुछ राज्यों में विधानसभाओं के चुनाव होंगे और लोकसभा चुनाव भी अधिक दूर नहीं, इसलिए कई लोग मान रहे होंगे कि सरकार ने इसके जरिए केंद्रीय कर्मियों को खुश करने का प्रयास किया है। लेकिन, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण कई सवाल हैं, जिन पर गौर करना जरूरी है। पहला, जब उनकी जेब में अच्छी-खासी धनराशि आएगी तो क्या यह मुद्रास्फीति में अतिरिक्त वृद्धि का सबब नहीं बनेगा? असंगठित क्षेत्र के उन लोगों का क्या होगा, जिनका वेतन इस तरह नहीं बढ़ता? इसलिए, क्या सरकार के पास मुद्रास्फीति से लड़ने की कोई रणनीति है, जो अन्य लोगों को राहत दिलाए? क्या यह वृद्धि सरकारी कर्मचारियों की उत्पादकता और कार्यकुशलता बढ़ाने में सहायक होगी? कामकाज में सुस्ती, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के लिए सरकारी दफ्तर बदनाम रहे हैं, जबकि निजी क्षेत्र में बेहतर उत्पादकता और कार्यकुशलता देखने को मिलती है। वहां कर्मचारियों के वेतन को कार्य-प्रदर्शन से जोड़ा जाता है और यह उन्हें अधिक जवाबदेह बनाता है। सरकारी कर्मचारियों को बेहतर कार्य-प्रदर्शन के लिए अनुकूल माहौल उपलब्ध कराना जरूरी है, लेकिन वेतन वृद्धि के साथ उनसे अपेक्षा रखी जानी चाहिए कि वे अपनी उत्पादकता और कार्यकुशलता बढ़ाएं। यह लक्ष्य सिर्फ बातों से नहीं, बल्कि किसी सुविचारित-सुनियोजित-सुक्रियान्वित कार्ययोजना से ही संभव है।

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  • Web Title: गरम जेब का गणित