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रक्षा-सूत्र और पूर्णिमा

पूर्णिमा आती है, तो मन हिलोर लेने लगता है। वह फिर आ गई है। हर महीने आती है वह। लेकिन हर पूर्णिमा कितना अलग एहसास देती है। शायद इसी वजह से अपने समाज ने उसे अलग-अलग ढंग से सेलिब्रेट किया है। हमारी हर पूर्णिमा किसी न किसीसे जुड़ी है। गुरु पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा वगैरह-वगैरह। और यह श्रावण की पूर्णिमा जुड़ी है रक्षाबंधन से। इसीलिए देश के इस इलाके में बहनें अपने भाइयों को राखी बांधने को बेताब हैं। रक्षाबंधन आज जसा है, क्या वैसा ही अपने मनीषियों ने सोचा होगा? आषाढ़ की पूर्णिमा गुरु से जोड़ी गई है। फिर यह अगली पूर्णिमा भाई-बहन तक सीमित कैसे हो गई? यह समझ में नहीं आता। अलग-अलग जगह उसे अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है। कहीं इसे जनई पूर्णिमा कहा जाता है, तो कहीं नारियली पूर्णिमा। लेकिन हर जगह कम से कम एक चीज समान है। वह है रक्षा सूत्र का विचार। चाहे राखी बांधनी हो, चाहे कलावा बांधना हो या जनेऊ पहनना हो, तीनों में सूत्र आता है। यानी एक धागे का बंधन। एक सूत के धागे में बंध जाना। अपने यहां तो हर मांगलिक काम में सूत्र बांधने की व्यवस्था है। आपके हर काम बिना रुकावट के हों, उसके लिए यह सूत्र बांधा जाता है। आज इस त्योहार को देख कर कभी-कभी गलतफहमी होती है कि यह रक्षा सूत्र एक कमजोर बहन अपने भाई के हाथ में बांधती है। पहले-पहल शची ने इंद्र के हाथ में सूत्र बांधा था। तब इंद्र अपनी पत्नी शची की रक्षा का वचन तो नहीं दे रहे थे। वहां तो शची अपने पति के सकुशल लौट आने की कामना कर रही थीं। दरअसल, कुशलता की कामना रक्षा सूत्र की भावना में है। यह कुशलता हम पूर मन से चाहते हैं। पूर्णता में चाहने की वजह से हम उसे पूर्णिमा पर मनाते हैं। अपनी पूर्णता में कुशलता की कामना। क्या विचार है? एक-दूसर की कुशलता हम इसी पूर्णता के साथ चाहें, तो यह दुनिया कितनी खूबसूरत हो जाएगी। जरा सोचिए तो!

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  • Web Title: रक्षा-सूत्र और पूर्णिमा