अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आशंकाओं के बादल

एक वियतनामी कहावत है कि एक औंस मिट्टी एक किलो सोने से ज्यादा महंगी होती है। बात बिल्कुल सच है, क्योंकि मिट्टी से अनाज पैदा होता है और इंसान के जिंदा रहने के लिए सोना नहीं, खाद्यान्न जरूरी है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने भविष्य का जो खाका खींचा है, उसमें खाद्य सुरक्षा पर मंडराता खतरा साफ दिखाई पड़ता है। परिषद के अनुसार चालू वर्ष में कृषि विकास दर महा दो प्रतिशत रहने की संभावना है जो पिछले तीन सालों की तुलना में सबसे कमजोर होगी। केवल किसानों के र्का माफ करने से खेती की तरक्की संभव नहीं है। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई, बिजली और उर्वरकों के मोर्चे को तुरंत संवारने की जरूरत है। दुर्भाग्य से इन तीनों मोर्चो पर सुधार के संकेत नहीं दिखते। ऐसे में खाद्य सुरक्षा की गारंटी कैसे दी जा सकती है? चिंता का विषय यह है कि देश के कृषि उत्पादन की औसत दर महा 1.6 प्रतिशत रह गई है जबकि जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार 1.प्रतिशत है। नतीजा सामने है। प्रति व्यक्ित खाद्यान्न खपत घटकर 10 में पड़े भीषण बंगाल अकाल के स्तर पर पहुंच चुकी है। सरपट दौड़ रही महंगाई के पैरों में बेड़ियां डालने के लिए रिार्व बैंक जो मौद्रिक उपाय कर रहा है, उनसे मुद्रास्फीति पर काबू पाना कठिन है। चालू महंगाई का बड़ा कारण आपूर्ति का संकट है और इसका रिश्ता खाद्यान्न उत्पादन से है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अभिजीत सेन समिति ने सुरक्षित भंडार का जो पैमाना तय किया था, अब उसमें संशोधन की भी जरूरत है। दूसरी हरित क्रांति का नारा लम्बे समय से उछाला जा रहा है किन्तु इस पर अमल के मामले में गंभीर प्रयास नहीं दिखते। उदारीकरण की नीतियां अपनाने के बाद शहरों और गांवों की आमदनी का अंतर और बढ़ गया है। लगातार घटते जोत के आकार के चलते कृषि घाटे का सौदा बन गई है जिस कारण देश के लगभग चालीस प्रतिशत किसान हल-बैल के बंधन से मुक्त होना चाहते हैं। यदि समय रहते गांव व खेती से जुड़ी समस्याओं का स्थायी हल खोजने का प्रयास नहीं किया गया तो स्थिति बेकाबू हो सकती है।ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: आशंकाओं के बादल