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वेतन ही नहीं काम की भी सोचें

छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को मानते हुए सरकार ने जिन केंद्रीय कर्मचारियों का वेतन बढ़ाया है, वे जनता के सेवक हैं, सरकार के सेवक नहीं। यह वह पहली बात है जिसे हमें इस मामले में याद रखना चाहिए। अब अगर वे सेवक हैं और सेवा करते हैं इसका कुछ रिवार्ड भी होना चाहिए। इसीलिए उन्हें तनख्वाह दी जाती है। फिर सिर्फ तनख्वाह ही काफी नहीं, उन्हें महंगाई से भी बचाकर रखना पड़ेगा, ताकि उन्हें किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। इसलिए ये जनसेवक समाज से अपेक्षा रखते हैं कि वेतन आयोग बने और उनकी तनख्वाह बढ़े, लेकिन जिस समाज से वे तनख्वाह बढ़ाने की अपेक्षा रखते हैं, उस समाज की भी कुछ अपेक्षाए हैं। अगर वे समाज की अपेक्षाओं पर खर नहीं उतरते तो उन्हें समाज से भी अपेक्षा रखने का अधिकार नहीं होना चाहिए। सिर्फ तनख्वाह के मामले में निजी क्षेत्र से तुलना करने से काम नहीं चलेगा, काम और परिणाम के मामले में भी तुलना करनी होगी। सेवा ही वह मापदंड है जिससे तनख्वाह भी तय होनी चाहिए और उसमें बढ़ोतरी भी। वेतन आयोग की रिपोर्ट में यह मापदंड कभी नहीं रहता। अगर सरकार का नजरिया सीमित रहे तो यह मापदंड रहेगा भी नहीं। हमने सिर्फ वेतन आयोग ही नहीं बनाए, प्रशासनिक सुधार आयोग भी बनाए हैं, लेकिन जितनी तत्परता वेतन आयोग की रिपोर्ट को मानने में दिखाई जाती है, उतनी कभी सुधार आयोग की रपट मानने में नहीं दिखाई जाती है। प्रशासन के अफसरों के प्रशिक्षण के लिए मसूरी में जो भारतीय प्रशासनिक संस्थान बना है वह हाारों फुट की ऊंचाई पर है। यहां से जो लोग प्रशिक्षण पाकर आते हैं, उनके व्यवहार में भी यही ऊंचाई दिखनी चाहिए थी, लेकिन यह ऊंचाई कहीं नहीं दिखती। आम आदमी यही सोचता है कि इन जनसेवकों से उसकी जान जितनी बची रहे उतना ही अच्छा है। उनके व्यवहार में प्रेम नहीं है, प्यार नहीं है, बड़प्पन नहीं है। वे वेतन में परिवर्तन चाहते हैं, लेकिन व्यवहार में परिवर्तन के लिए वे तैयार नहीं होते। आप वेतन के बार में बोल रहे हैं तो भ्रष्टाचार के बार में भी कुछ बोल दीजिए। भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है, इसे कम करने के बार में कोई ऐलान नहीं होता। भारत शब्द के साथ भ्रष्टाचार शब्द ऐसे जुड़ गया है जसे अब यह अलग ही नहीं हो सकता। यह भ्रष्टाचार उस सारी प्रगति को रोक रहा है जिसके लिए बढ़ी तनख्वाह की अपेक्षा रखने वाला यह सारा अमला है।हर बार यही होता है कि चुनाव आते हैं तो वेतन आयोग की रिपोर्ट मान ली जाती है। केंद्र सरकार के पचास लाख से ज्यादा कर्मचारी हैं, तकरीबन 54 लाख। चुनाव के वक्त कोई भी सरकार उन्हें खुश रखना चाहती है। कम से कम यह ध्यान तो रखती ही है कि किसी बात पर वे दु:खी न हों। ये वे लोग हैं जिनकी डय़ूटी पोलिंग बूथ पर लगती है। अगर उनसे दुश्मनी हो गई तो दिक्कत हो सकती है। यही वे लोग हैं जो बक्से में वोट भरवाते हैं। लेकिन हम इस बात को हमेशा भूल जाते हैं कि बक्से में वोट डालने का काम तो आखिर में जनता ही करती है। अगर जनता नाराज हो गई तो सरकार को कौन बचाएगा? इस बार सरकार ने सेना की भी सुन ली है। पहली बार ऐसा हुआ कि सेना को इसके लिए बोलना पड़ा। इसके पहले तो वे बोलते भी नहीं थे। प्रशासन वाले उनकी अनदेखी करके अपनी तनख्वाह बढ़ा लेते थे। वे मोर्चे पर जाकर लड़ते थे, अपनी जान की बाजी लगाते थे और तनख्वाह इनकी बढ़ जाती थी। अब यही कर्मचारी अपनी बढ़ी हुई तनख्वाह लेकर बाजार जाएगा तो बाजार पहले ही उसके स्वागत के लिए तैयार हो चुका होगा। तनख्वाह बढ़ाने के ऐलान के चौबीस घंटे बाद ही बाजार में कीमतें बढ़ जाती हैं। सरकार को वेतन आयोग की रिपोर्ट मानने में देर हो सकती है, लेकिन बाजार को कीमत बढ़ाने में समय नहीं लगता। कर्मचारी जब बढ़ी हुई कीमतों के बार में पूछेगा तो दुकानदार कहेगा कि आपकी भी तो तनख्वाह बढ़ी है, हमार दाम बढ़ गए तो क्या हुआ। लेकिन बाजार में दाम सिर्फ इन्हीं कर्मचारियों के लिए नहीं बढ़ेंगे, सबके लिए बढ़ेंगे। आम उपभोक्ताओं पर इसका सीधा असर होगा, खासकर उन पर जो सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, जिनके लिए वेतन आयोग नहीं बनते, जिनकी इस तरह से तनख्वाह नहीं बढ़ती। जिन्हें किसी तरह का कोई महंगाई भत्ता भी नहीं मिलता। तनख्वाह तो कुछ ही लोगों की बढ़ेगी लेकिन लुट तो सभी जाएंगे। पहले ही काफी महंगाई है। हर हफ्ते आने वाला मुद्रास्फीति का आंकड़ा लगातार चढ़ता जा रहा है। यह और बढ़ेगा तो लोगों की समस्याएं भी और बढ़ेंगी। गरीबों के लिए तो जीना भी मुश्किल हो जाएगा। सरकार के पास इस महंगाई से निपटने की कोई रणनीति भी नहीं है। इंदिरा गांधी के समय जब महंगाई बढ़ने लगी थी तो उन्होंने सुपर बाजार शुरू किए थे। हमें पता था कि इस बाजार तक हर कोई नहीं पहुंच सकता। तब हमने आकाशवाणी से सुपर बाजार के सामान की कीमतों का प्रसारण शुरू कर दिया। इसका असर सार बाजार पर हुआ और वहां भी कीमतें नीचे आने लगीं। लोगों को बिना सुपर बाजार गए कम दाम पर सामान मिलने लगा। अब ऐसा नहीं होता। पिछले वेतन आयोग ने सरकारी कर्मचारियों की संख्या कम करने की बात की थी। बाकी सिफारिशें मान ली गईं, लेकिन इसी को छोड़ दिया गया। कर्मचारियों की संख्या तो उल्टे बढ़ ही गई है। वैसे हम डाउनसाक्षिंग और तरह-तरह की बात करते हैं, लेकिन ऐसे मौकों पर भूल जाते हैं। वैसे ऐसी बहुत सी सिफारिशें हैं, जो पिछले वेतन आयोगों ने की थीं, लेकिन उनका जरा भी ध्यान नहीं रखा जाता। एन. के. पी. साल्वे की अध्यक्षता में बने आयोग ने कहा था कि तनख्वाह बढ़ाने से पहले राज्यों पर पड़ने वाले उसके असर को भी देख लेना चाहिए। लेकिन यह कभी नहीं होता। केंद्रीय कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ी है तो राज्य के कर्मचारी भी इसकी मांग करंगे। हम समान कार्य के लिए समान वेतन की मांग करते हैं तो उनकी भी तनख्वाह बढ़ानी ही पड़ेगी। कर्मचारी केंद्र और राज्य के होते हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था तो पूर देश की एक ही हेाती है। वह तो केंद्र और राज्य में नहीं बंटी होती। वह तो सब पर असर डालेगी। उन पर भी जो कर्मचारी नहीं हैं।ड्ढr लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं, वे योजना आयोग के सदस्य रह चुके हैंड्ढr प्रस्तुति : हरािंदर

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