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जम्मू का यक्षप्रश्न

देश में हर मामले में राजनीति होने लगी है। चाहे वह गुर्जरों के आरक्षण का मामला हो या फिर अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन आवंटन का। अपने हक के लिए आंदोलन करना कोई बुरी बात नहीं है पर हिंसा-प्रतिहिंसा करना बुरी बात है। कारण कि इससे देश की एकता-अखंडता व मिश्रित संस्कृति प्रभावित होती है। पीडीपी व अन्य दलों को सोचना चाहिए कि 1860 से जारी अमरनाथ यात्रा राष्ट्रीय यात्रा का प्रतीक है और यात्रियों की सुविधा व सुरक्षा का ध्यान रखना उनका उत्तरदायित्व है। हिंसा से मामले नहीं सुलझते हैं।ड्ढr हर्षवर्धन कुमार, गांधी विहार, दिल्ली शर्म आनी चाहिए अवैध कब्जों के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने मजबूरन जो टिप्पणी की है उस पर सरकार को शर्म आनी चाहिए। यदि सरकार इतना भी नहीं कर पाती है तो फिर उसे सत्ता में रहने का क्या हक है? हमार नेता और नौकरशाहों की चमड़ी इतनी मोटी है कि सिवाय वोट-नोट के इन्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता है।ड्ढr वेद, मामूरपुर, नरला दिल्ली की धमनियां पर्यावरणविद फैयाज अहमद खुदसर का कहना है ‘जाम हो गई हैं दिल्ली की धमनियां।’ शहंशाहों की रानी दिल्ली स्वयं अपनी पहचान खोती जा रही है। उसका जिस्म थुलथुल होता जा रहा है। अब तो ताजी हवा भी दिल्ली के अन्दर आने की बजाय बाई-पास से बाहर निकल जाती है। पुरानी सुडौल दिल्ली के अब केश भी झड़ने लगे हैं। आराम की चाहत में सारी रात जागती है। वन क्षेत्र पर राष्ट्रमंडल खेलों की नजर लग गई है। प्रशासन धुंधली आंखों से गगनचुम्बी इमारतों को तो देख सकता है, परन्तु दिल्ली की हरियाली उसे नहीं दिखाई देती।ड्ढr राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली या खुदा! सांस अटकी की अटकी रह गई हमारी तो जब हमने अखबारों में सरकार के प्रति देश के सर्वोच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणी पढ़ी। जब सरकार की यह हालत है तो कहा जा सकता है कि देश को बचाना भगवान के वश में भी नहीं है। देश के नेता तथा नौकरशाह सरकारी भवनों को खाली करने को तैयार ही नहीं हैं। सरकार की इसमें कोई दिलचस्पी भी नहीं है।ड्ढr इन्द्र सिंह धिगान, किंगवे कैम्प, दिल्ली अभिनव का स्वर्ण अभिनव बिंद्रा ने स्वर्ण पदक तक पहुंचने में खुद का पैसा लगाया है। उनका अपना खुद का कोच है। बीजिंग गए 56 खिलाड़ियों के दल के साथ 42 अधिकारी भी गए हैं, साथ ही कॉमन वेल्थ गेम के नाम पर 100 अधिकारियों का एक और दल भी उनके साथ गया है। इनकी कोई जरूरत नहीं थी। हमार गांव, कस्बों और छोटे शहरों में भी प्रतिभाएं रहती हैं, लेकिन सिस्टम इतना खराब है कि प्रतिभा वहां से निकल कर आ ही नहीं पाती है। मोनिका देवी का डोप टेस्ट में फेल होना एक बड़ा सवाल है। अभिनव बिंद्रा के स्वर्ण जीतने के बाद ये सवाल नहीं उठता कि क्या अब समय नहीं है कि क्रिकेट के साथ-साथ अन्य खेलों पर भी ध्यान दिया जाए, साथ ही जो भ्रष्टाचार इन खेलों में प्रवेश कर गया है उसे बाहर निकाला जाए। जिससे अन्य खेलों में भी भारत अपना सीना तान खड़ा हो सके।ड्ढr चंदन कुमार चौधरी, कटवारिया सराय

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