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खुशी से छलक गईं मां की आंखें

ओलंपिक में आंसुओं का बहाव देखने को बहुत मिल रहा है। कभी पदक न मिलने पर और कभी पदक मिलने पर। खुशी और गम दोनों तरह के आंसू। स्वीमिंग पूल के शार्क पुरुष माइकल फेल्प्स की मां देबोरा फेल्प्स की आंखों में आंसू कुछ और ही कहानी कहते हैं। ये आंसू बेटे की सफलता पर बेबस बहते हैं और रुकने का नाम नहीं लेते। एक बार नहीं बल्कि बार बार। जब जब बेटा सफल होकर मां के पास आता है वह रोने लगती है। वाटर क्यूब में जब फेल्प्स ने आठवां गोल्ड जीता तो सारी दर्शक दीर्घाएँ तालियों की गूंज से गुंजायमान हो गईं। पर दो जोड़ी आंखे थीं जो आंसू टपका रही थीं। जब फेल्प्स उनके पास पहुंचे तो लोग ताली बजा रहे थे और तीन जन-भाई, बहन और मां रो रहे थे। बीजिंग में अद्वितीय एथलीट की छवि को अंजाम दे चुके माइकल ने अपनी मां को यहां खूब रुलाया है। पर ऐसा रोना जिसकी हर मां कामना करगी। फेल्प्स जब अपनी मां को पदक जीतने के बाद मिला गुलदस्ता भेंट करते हैं तो देबोरा के आंसू अतीत की कई घटनाओं को पिरोए होते हैं। उस संघर्ष के काल को भी वह याद करती हैं जब जीवन दिशाहीन हो गया था। खुद टीचर रहीं और अब प्रशासनिक अधिकारी बन चुकीं देबोरा को रह रह कर वह क्षण याद आते हैं जब और टीचर उनसे कहती थीं कि तुम्हारा बेटा कभी किसी चीज पर ध्यान नहीं लगा सकता। यह कभी कामयाब नहीं हो पाएगा। माइकल फेल्प्स की हाइपर एक्िटविटी डिसआर्डर की कहानियां और उनके माता पिता के तलाक की बातें पुरानी हो चुकी हैं। यहां बीजिंग में तो मां बेटे का यह अनोखा भावनात्मक पहलू हर सफलता के बाद दिखा है। जब मीडिया उन्हें घेरकर पूछता कि क्या लगता है माइकल तोड़ पाएगा स्पिट का 7 गोल्ड का रिकार्ड। तो वह कहतीं, मैं मां हूं कोच या एजेंट नहीं। मुझे चार, पांच, छह से कोई मतलब नहीं। मैं तो बेटे को सफल होते देखने आई हूं।

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