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नेता कश्मीर जाएं

श्मीर जल रहा है और सार नेता दिल्ली में बैठे राजनीति कर रहे हैं। गृहमंत्री, नेता विपक्ष, अन्य दलों के नेता और देश के ज्यादातर सांसदोंे को इस समय जम्मू और कश्मीर में जाकर आग बुझाने का काम करना चाहिए। इस समय उस भूमिका की जरूरत है, जो महात्मा गांधी ने नोआखाली में अपनाई थी। अगर हम यह आग समय रहते नहीं बुझा सके तो आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी।ड्ढr नंदलाल कायस्थ, इंदिरापुरम सूखा और बाढ़ साल में नौ महीने हम सूखा-सूखा रोते रहते हैं, बाकी तीन महीने बाढ़-बाढ़। यह तो हम चाहते हैं कि खूब अच्छी बारिश हो, अच्छी फसलें हो, लेकिन सच यही है कि अच्छी बारिश और उसके नतीजों से निपटने के लिए हमारी कोई तैयारी नहीं होती। इसी तरह से जब सूखा पड़ता है तो पता लगता है कि हम सूखे से निपटने के लिए भी तैयार नहीं हैं।ड्ढr अरविंद सक्सेना, सेक्टर-4नोएडा सजा तक पहुंचे अपराधी अहमदाबाद में हुए विस्फोटों के अभियुक्त का पकड़ा जाना एक अच्छी खबर है। इस गिरफ्तारी के बाद पूरा गुजरात प्रशासन वाहवाही बटोरने में लग गया है। नि:संदेह यह काम तरीफ के काबिल है, लेकिन यह काम अभी पूरा नहीं हुआ है। प्रशासन का काम तो तभी पूरा होगा, जब वह आतंकवादियों को आखिरी अदालत तक से सजा दिलावा सके। ऐसे मामलों में खुशी मनाता प्रशासन बाकी काम भूल जाता है और आतंकवादी छूट जाते हैं।ड्ढr भोलानाथ कश्यप, फरीदाबाद जिम्मेदार कौन? जम्मू-कश्मीर में श्राइन बोर्ड के विवाद को लेकर बने हालात के लिए राजनीति जितनी जिम्मेदार है, उतने ही जिम्मेदार लोग भी हैं। दोनों समुदायों की जनता ही जब एक-दूसर को फूटी आंख नहीं सुहाती तो मौकापरस्त राजनेता और देश विरोधी ताकतें इसका लाभ उठाएंगी ही। हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष की आड़ में अपनी राजनीति चमकाने वाला वर्ग एक भी मौका चूकता। अब जम्मू-कश्मीर के हालात काफी बिगड़ चुके हैं। शायद आसानी से काबू नहीं पाया जा सकेगा। जनता को इन सवालों पर ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए। वैसे दोनों ही समुदायों के लोगों को प्रवचन सुनाने वाले हाारों पैदा हो चुके हैं। ऐसे ही लोगों के पीछे जनता भागती भी है। लोगों को भगवान तक पहुंचने का रास्ता बताने वाले लोगों को क्यों नहीं समझाते कि विवाद में केवल आम लोगों का ही नुकसान है। देखा जाए तो इन हालात के लिए केवल राजनीति ही जिम्मेदार नहीं है, बुद्धिाीवी और आम जनता भी बराबर की हिस्सेदार है।ड्ढr निर्मल सिंह, मोहाली श्राइन बोर्ड मुद्दे पर राजनीति जम्मू और कश्मीर के हालात अब नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं। आतंकवाद पीड़ित क्षेत्र में सुधार के जो लक्षण दिखाई दिए थे, वे अब धीर धीर क्षीण होते जा रहे हैं। राजनीतिक दल सुलझाने के प्रयास तो करते हैं, लेकिन उनके प्रयासों में ईमानदारी नहीं दिख रही। क्षुद्र राजनीतिक लाभ ने शांति की राह पर चल रहे जम्मू और कश्मीर को फिर से झुलसा दिया है।ड्ढr राजवीर सिंह दुग्गल, चंडीगढ़

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