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ब्लॉग वार्ता : नए जमाने के सुखनवर

शाम-ए-गजल अब हर पहर मौजूद है, ब्लॉग की महफिल में। स्मृतियों के गोताखोर ब्लॉगर न जाने कहां-कहां से ढूंढ़ कर ला रहे हैं उन आवाजों को, जिन्हें अब सुनने का वक्त नहीं रहा। एक ही वक्त है ट्रैफिक जाम में फंसे रडियो सुनने का तो वहां भी रडियो जॉकी गलियों-नुक्कड़ों की खी-खी ही-ही को ऐसे पेश कर रहे हैं जसे कोई सुखन रच रहे हैं। बहरहाल सर्वव्यापी पतन की इन नकारात्मक चिंताओं से मुक्त होना हो तो लॉग कीािए ड्ड द्धrद्गथ्=द्धह्लह्लश्चज्ह्यह्वद्मद्धड्डठ्ठह्यड्ड5.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व।द्धह्लह्लश्चज्ह्यह्वद्मद्धड्डठ्ठह्यड्ड5.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व। सुखनसाज का पन्ना खुलेगा और आवाज खिलेगी मेंहंदी हसन की। कोई हद नहीं है कमाल की। कोई हद नहीं है जमाल की। अपनी तरफ से एक पंक्ित और जोड़ देता हूं। कोई हद नहीं है ब्लॉग की। इंदौर के संजय पटेल सिर्फ सुनाने के लिए मेंहंदी हसन साहब की इस गजल को नहीं पेश कर रहे बल्कि बताने के लिए कि किस तरह इस गजल में रिवायती बाजों से अलग सिंथेसाक्षर और हवाइन गिटार का इस्तेमाल किया गया है। मेंहंदी हसन साहब की गजलों में बंदिश, एक खास मूड को जाहिर करती है यहां बहुत कोमल स्वरों की आमद हुई है। ऐसी गजलों को सुनने के लिए एक आपकी मानसिक तैयारी होनी भी जरूरी भी है (ये बात उनके लिए जो इस गजल को पहली बार सुनने वाले हैं)। तो गजल कैसी सुनी जाए इसकी भी हिदायत यहां है। बकायादा मीर तकी मीर की एक गजल से इसकी मुनादी की जाती है। गोश को होश के टुक खोल के सुन शोर-ए-ाहां। सबकी आवाज के परदे में सुखनसाज है एक। गजल सुनने के लिए वक्त चाहिए और गजल सुनते-सुनते पुराने वक्त में लौटने का धीरा भी। संजय पटेल उस मास्टर मदन को फिर से जिंदा कर देते हैं जो सिर्फ चौदह साल की उम्र में इस दुनिया से विदा हो गए। जिनकी आवाज किसी म्यूजिक स्टोर में नहीं मिलती। जालंधर के खानखान गांव में जन्मे मास्टर मदन का पूरा परिचय है यहां। उनकी एक गजल सुखनसाज पर पेश है। यूं न रह-रह के हमें तरसाइए, आइए, आ जाइए, आ जाइएड्ढr फिर वही दानिश्ता ठोकर खाइए, फिर मेर आगोश में गिर जाइएड्ढr मेरी दुनिया मुन्तजिर है आपकी, अपनी दुनिया छोड़ कर आ जाइए।ड्ढr सुखनसाज गजलों के बार में हमें साक्षर करता है। अहमद फराज से लेकर बेगम अख्तर की दुनिया यहां आबाद हे। तन्हाई की महफिल सजी है यहां। युगविमर्श नाम से ब्लॉग पर भी बहुत सार सुखनवर मिलेंगे। ड्ड द्धrद्गथ्=द्धह्लह्लश्चज्4oद्द1न्द्वड्डrह्यद्ध.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्वद्धह्लह्लश्चज्4oद्द1न्द्वड्डrह्यद्ध.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व टाइप कीािए तो औबैदुल्लाह अलीम की एक गजल कहती है- अजीज उतना ही रक्खो कि जी संभल जाए, अब इस कदर भी न चाहो कि दम निकल जाए। ड्ड द्धrद्गथ्=द्धह्लह्लश्चज्द्वड्डद्धद्गठ्ठद्वद्गद्धह्लड्ड.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्वद्धह्लह्लश्चज्द्वड्डद्धद्गठ्ठद्वद्गद्धह्लड्ड.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व कर्नाटक का यह ब्लॉगर प्रत्येक वाणी में महाकाव्य ढूंढता है। बल्कि ब्लॉग का यही नाम है। तलत महमूद के दीवाने तैंतीस साल के महेन मेहता कालेज में तलत ही कहलाते थे। नौजवानी की उम्र में शौक तलत महमूद की आवाजों का। ब्लॉग न होता तो ऐसे दीवानों का पता नहीं चलता। लेकिन यह दीवाना सिर्फ फरीदा खनम और बेगम अख्तर तक ही सीमित नहीं है। हिंदी के उन तमाम ब्लॉग पर जाइए तो उनकी सूची में दुनिया के दूसरी भाषाओं के भी जुड़े गायब शुमार हैं। महेन मेहता ने ग्रीस की गायिका नाना मौस्कौरी का जिक्र किया है। यूरोप की तमाम भाषाओं में गाने वाली नाना मौस्कौरी के दीवाने महेन फरीदा खानम को फरीदा आपा कहते हैं। कतील शिफाई की गजल को पेश करते हैं जिसे गाया है फरीदा खानम ने। चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी, वरना हम जमाने भर को समझाने कहां जाते। एक क्िलक भर से फरीदा खानम की आवाज भीतर तक उतर जाती है। हिन्दी ब्लॉगिंग कई प्रतिभाशाली लोगों को एक दूसर तक पहुंचने का मौका दिया है। ये वो तमाम कोशिशें हैं जिनके लिए मीडिया जसे सार्वभौमिक प्रचारक के पास वक्त और स्पेस नहीं है। ड्ड द्धrद्गथ्=द्धह्लह्लश्चज्स्र्न्द्यह्यद्गroह्यद्ग.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्वद्धह्लह्लश्चज्स्र्न्द्यह्यद्गroह्यद्ग.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व यहां आइए तो एक उम्र की बेचैनी गजलों के बहाने मुक्ित पा रही है। गाजियाबाद की अरुणा राय की प्रोफाइल में यह पंक्ित कुछ यूं पड़ी थी- प्यार करने का जो खूबां हम पर रखते हैं गुनाह उनसे भी तो पूछिए, तुम इतने क्यों प्यार हुए। जाहिर है मीडिया के भाषा के सामान्यीकरण के बाद भी विविधता बची हुई है। तमाम वे शब्द ब्लॉग पर मिलते हैं जो अब शब्दकोष में आराम कर रहे हैं। अरुणा की एक लाइन है- बख्शता क्यों नहीं, तू कैसा खुदा है। संग-संग कौन है गर तू जुदा है। अच्छी रचना अक्सर बच जाती है। कोई न कोई उसे बचा लेता है। हिन्दी के ब्लॉग उन तमाम अच्छी रचनाओं को बचा रहे हैं, जिन्हें हम भूलने लगे हैं।ड्ढr लेखक का ब्लॉग है ड्ड द्धrद्गथ्=द्धह्लह्लश्चज्ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्वद्धह्लह्लश्चज्ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व

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