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गरीबी की कीमत

फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर में लतिका के बचपन का किरदार निभाने वाली रूबीना को बेचने की कोशिश, फिल्म के पीछे की असलियत को सामने लाती है। रूबीना के पिता पर आरोप है कि उसने एकाएक सेलिब्रेटी बन गई अपनी बेटी की अंतरराष्ट्रीय ख्याति का फायदा उठाकर उसे डेढ़ करोड़ में बेचने की कोशिश की। उसके पिता ने इस बात से इंकार किया है, लेकिन यह तो जाहिर है कि फिल्म की शोहरत और उसके कलाकारों के जबर्दस्त प्रचार ने स्लमबस्ती में संभवत: एसे कई करोड़पति बनने के सपनों को जन्म दिया है। फिल्म के पर्दे पर भले ही झुग्गी में रहने वाले बच्चों की जिंदगी बदली हो, पर हकीकत में वे आज भी एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती धारावी में ही रहते हैं, जहां बच्चों की देखभाल, पोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। एसे में रूबीना और अजहरुद्दीन को मिली शोहरत उनके अभिभावकों को अपना जीवन सुखमय बनाने का एक रास्ता नार आ सकती है। दौलत और शोहरत का नशा केवल अमीरों के सिर चढ़कर नहीं बोलता, गरीबों को भी यह उतना ही लुभाता है। कुछ दिन स्वप्नलोक सी दुनिया में बिताने के बाद घनघोर गरीबी और बादशाहों जसे ठाट-बाट, इन दो किनारों में संतुलन बनाना कठिन हो जाता है। फिल्म बनाने वालों ने बांद्रा स्लम में रहने वालों के जीवन-स्तर में सुधार के लिए चार करोड़ का कम्युनिटी फंड बनाया था। रूबीना और उनकी शिक्षा और अन्य जरूरतों के लिए ‘जय हो’ नामक ट्रस्ट भी बनाया गया था। ट्रस्ट में दोनों के परिवारों के रहने के लिए मकान देने की बात भी थी। राज्य सरकार ने भी रूबीना को मकान देने का वादा किया था। अगर वे वादे पूर हो रहे हैं तो बच्ची को बेचने की कथित वजह गले नहीं उतरती। फिल्म की शोहरत ने इन बच्चों को तो इतनी प्रसिद्धि दिला दी कि हर कोई इनके सुख-दु:ख के बार में जानने को उत्सुक है, पर उनके निजी जीवन के यह मंजर दिखा रहे हैं कि इन्हीं झुग्गियों में रहने वाले हाारों बच्चे बिकने या वेश्यावृति को मजबूर हैं। गैरों द्वारा नहीं, भारत की गरीबी और अमानवीयता का चटखारदार स्टिंग बनाने वालों द्वारा नहीं, हम सबके और हमारी सरकार के द्वारा।

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  • Web Title: गरीबी की कीमत