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धर्म, धरती और हम

भोग-विलास की पूर्ति के लिए बेबस और बंधक-सी बनी धरती को कभी बाबा नानक ने परमात्मा द्वारा स्थापित धर्मशाला को उदात और आध्यात्मिक दर्जा दिया था। धरती के कण-कण में ब्रह्म की सत्ता के अनुभव से वे इतने गद्गद हुए कि स्वयं को उस अनंत पर बलिहार कर दिया- ‘बलिहारी कुदरत वसिआ, तेरा अंत न जाइ लखिआ॥’ पैगंबर मोहम्मद साहिब ने धरती को अल्लाह की पवित्र रचना कहा और उसकी तन-मन से हिफाजत करन की हिदायत देते हुए फरमाया, ‘यह दुनिया हरी-भरी और खूबसूरत है और अल्लाह ने तुम्हें इसका खिदमतगार मुकर्रर किया है।’ पहले खलीफा अबू-बक्र की एक खास हिदायत धरती और उसके जीवों की हिफाजत के बाबत थी। पर्शिया में मिर्जा हुसैन अली के सिद्धांत और विचारों से जन्मे बहाई धर्म के फलसफे में पर्यावरण और इंसानी सभ्यता को एक-दूसरे से जोड़ कर देखा गया है, ‘मनुष्य जगत का अंग है। इसका अंदरूनी जीवन पर्यावरण का रूप तय करता है और खुद भी उससे गहराई तक प्रभावित होता है। एक का असर दूसरे पर पड़ेगा ही और मनुष्य के जीवन में होने वाली हरेक तब्दीली इन पारस्परिक प्रतिक्रियाओं का ही नतीजा है़.़’ धरती के साथ-साथ उसके स्रेतों की मनोयोग से रक्षा के संबंध में बौद्ध-मत का तत्व दर्शन एकदम स्पष्ट है, ‘धरती की उन वस्तुओं, जिनकी दोबारा भरपाई नहीं हो सकती, का इस्तेमाल तभी करना चाहिए, जब कोई दूसरा चारा न हो। पर ऐसा करते हुए भी सख्त सावधानी बरती जानी चाहिए और संरक्षण का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।’ भगवान महावीर ने भोग-उपभोग में संयम और सदाचार का जो व्रत अहिंसा पालन के रूप में विश्व को दिया, उसका आशय था- पदार्थ ज्यादा काम में मत लो, अनावश्यक वस्तुओं का उपभोग मत करो। इसी का नाम अहिंसा है। जाहिर है, विश्व के सभी ज्ञात धर्म धरती और उसके बहुमूल्य खजान के संरक्षण को रेखांकित करते हैं। काश, धर्म को मानने वाले धर्माचार्यों की बात भी मानते आये होते तो आज धरती का वजूद दांव पर न लगा होता।

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