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सीबीआई : निष्पक्षता और न्यायिक विलंब

ेंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के कामकाज को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं कि यह केन्द्र सरकार के इशारे पर काम करता है। उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ज़े एस़ वर्मा ने अभी हाल में दु:ख व्यक्त किया है कि किसी राजनेता के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में ब्यूरो का पक्ष क्या होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस सरकार से उस नेता के सम्बंध कैसे हैं। ब्यूरो की स्थापना भ्रष्टाचार की समस्या को जड़मूल से ख़त्म करने के लिए की गयी थी। स्वाभाविक है कि यदि ब्यूरो किसी तरह के दबाव में काम करेगा तो अपेक्षित परिणाम देने का सामथ्र्य खो देगा। उच्चतम न्यायालय ने राजनीतिक दबाव के इस खतरे को पहचाना और इसलिए जैन हवाला मामले में जांच की निगरानी की जि़म्मेदारी उसने अपने ऊपर ले ली, क्योंकि इसमें कई बड़े राजनेताओं के विरुद्ध आरोप थे। अन्वेषण की निगरानी न्यायालय द्वारा किये जान का उद्देश्य इसकी निष्पक्षता सुनिश्चित करना था, परंतु यह निर्णय विवाद से परे नहीं था। यह पुलिस के कामकाज में हस्तक्षेप था। 1े किंग इम्परर बनाम नजी़र अहमद मामले में प्रीवि काउंसिल द्वारा दिया गया निर्णय आज भी मान्य है कि पुलिस को स्वतंत्र रुप स काम करना चाहिए। इतना ही नहीं, अदालत ने विनीत नारायण मामले में दिशा-निर्देश दिये कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और केन्द्रीय सतर्कता आयोग का पुनर्गठन किस तरह किया जाना चाहिए ताकि यह बाहरी प्रभावों से अक्षुण्ण रहे तथा यह कि मुख्य सतर्कता आयुक्त का चुनाव वैसे किया जाना चाहिए। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ज़े एस़ वर्मा ने निर्णय दिया, ‘कार्यपालिका की जवाबदेही है कि वह कार्यकारी आदेश के ज़रिये शून्य को भरे, क्योंकि इसका कार्यक्षेत्र विधायिका के कार्यक्षेत्र से मिलता है, और जहाँ किसी भी कारण स कार्यपालिका भी अकर्मण्य हो, न्यायपालिका को उन प्रावधानों के तहत संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन के अन्तर्गत एक समाधान देन के लिए आगे आना होगा, जब तक कि विधायिका इसके लिए उचित कानून बनाकर अपनी भूमिका न निभाये। इन निर्देशों का उस समय अनुपालन नहीं हुआ, लकिन उच्चतम न्यायालय ने इसे संघ बनाम प्रेम प्रकाश हिदुंजा में अदालत की अवमानना मानने से इनकार करते हुए फैसला दिया कि केन्द्रीय सतर्कता आयोग को कानूनी दर्जा दिये जान के बारे में दिये गये निर्देश इस तरह के नहीं माने जाने चाहिए जिसका अनुपालन न करना अदालत की अवमानना मानी जाए। अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जान की बात महसूस की, किंतु यह विनीत नारायण मामले में दिये गये निर्देशों का मजा॥क बनाना हुआ। हालांकि बाद में केन्द्रीय सतर्कता आयोग को कानूनी दर्जा दे दिया गया और इसके आयुक्त तथा केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो के निदेशक के चयन की एक प्रक्रिया भी निर्धारित की गयी, परंतु अपेक्षित परिणाम नहीं मिला क्योंकि इन पदों पर ऐसे अधिकारियों को बिठाया जाता है, जो अपनी स्वतंत्र सोच के लिए न जाने जाते हों। हवाला मामले में सभी अभियुक्तों को निचली अदालत ने छोड़ दिया क्योंकि जो सबूत थे जैन बंधुओं की डायरी में नामों के पहले अक्षरों के, उन्हें प्रमाण नहीं माना गया। उच्च न्यायालय ने भी अपील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति ज़े एस़ वर्मा का कहना है कि अभियुक्त इसलिए छूट गये क्योंकि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने अधकचरे आरोप पत्र दाखिल किये। उल्लेखनीय है कि ब्यूरो उच्चतम न्यायालय की निगरानी में अन्वेशण कर रहा था और न्यायमूर्ति वर्मा स्वयं इस पर नज़र रखे हुए थे। मामले में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश वर्मा ने एक दिन खुली अदालत में यह कहकर सनसनी पैदा कर दी थी कि इस मामले में जजों पर दबाव डाला जा रहा है। दुनिया को कभी पता नहीं चल पाया कि दबाव डालने वाले ये ताकतवर लोग कौन थे क्योंकि मुख्य न्यायधीश ने न तो उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की और न ही इस बारे में किसी नाम का खुलासा किया। इसी तरह दिल्ली दंगा के मामलों में पुलिस ने इतने दिनों तक अपना काम नहीं किया तो आखिर अदालतें क्या करती रहीं? अदालतों में मामल कई दशकों तक लम्बित रहते हैं और इस विलंब के लिए न्यायपालिका केवल जजों की कम संख्या को जि़म्मेदार मानती है, जबकि सच्चाई यह है कि अक्षमता विलंब की सबसे बडी़ वजह है। एक सक्षम जज जितने समय में जितने मामलों का निष्पादन करता है, वहीं एक कम सक्षम जज उसस कहीं कम मामलों का निष्पादन कर पाता है। साथ ही निष्पादन की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है। यदि निर्णय सही एवं सटीक है तो अपील की गुंजाइश कम रहती है। लेखक टीवी पत्रकार हैं

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