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जानलेवा परीक्षण

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में दवाओं के परीक्षण के दौरान 4बच्चों की मौत के आरोप की जांच का परिणाम जो भी आए, इस मुद्दे से जुड़े कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर खोजा जाना जरूरी है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि अनेक विदेशी बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनियां इंसान पर दवाओं के परीक्षण के लिए हिन्दुस्तान का रुख कर रही हैं। विकसित देशों के मुकाबले हमारे यहां ऐसे परीक्षणों पर लगभग 60 प्रतिशत कम खर्च आता है। इंसानों पर किए जाने वाले दवा परीक्षणों के लिए भारत में न तो कड़े मापदंड हैं और न दोषियों को सजा देने का स्पष्ट कानूनी प्रावधान। ड्रग एंड कॉस्मेटिक संशोधित विधेयक-2007 अभी तक संसद के पास पड़ा हुआ है जिस कारण इंसान को जानवरों की भांति अपनी खोज में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना कठिन है। औषधियों की खोज के लिए परीक्षण की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन जब खतरनाक प्रयोगों की शिकार गरीब और अशिक्षित जनता होने लगे तब आवाज उठाना जरूरी हो जाता है। ऐसे परीक्षण के लिए स्वेच्छा से तैयार होने वाले लोगों का बीमा कराया जाना अनिवार्य होना चाहिए। एम्स एक प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान है, यदि वहां लापरवाही का मामला सिद्ध हो जाता है तब निजी संस्थानों की स्थिति तो अनुमान से परे ही मानी जाएगी क्योंकि वहां नियमों से खिलवाड़ की गुंजाइश यादा होती है। इस मामले पर माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सांसद वृंदा करात ने जो चिंता व्यक्त की है उससे अहसमत होना कठिन है। मानव पर दवा परीक्षण का भारत एक बड़ा बाजार बन गया है। यहां जिन दवाओं का परीक्षण हो रहा है, उनमें से अधिकांश विकसित देशों की जरूरत के लिए हैं। ऐसे में ड्रग एंड कॉस्मेटिक विधेयक में शीघ्र संशोधन किया जाना चाहिए। इस विधेयक में दोषियों को पांच वर्ष की कैद और दस लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान तभी कारगर सिद्ध होगा जब इसे लागू करने के लिए एक मजबूत मशीनरी खड़ी कर दी जाएगी। बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनियों को भारत की गरीबी और अशिक्षा का लाभ उठाने की अनुमति किसी सूरत में नहीं दी जा सकती।

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