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व्यवस्था में छेद

अमेरिकी नागरिक केनेथ हेवुड का रहस्यमय तरीके से देश छोड़कर चले जाना हमारी सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों की नाकामी दर्शाता है। 26 जुलाई को अहमदाबाद में हुए बम धमाकों के महा पांच मिनट पहले किसी ने उनका ईमेल एकाउंट हैक करके मीडिया को इस आतंकवादी घटना के बार में मैसेज भेजा था। इस सिलसिले में पुलिस ने हेवुड से पूछताछ की। यह पूछताछ आगे भी होनी थी। उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया ताकि वे किसी भी सड़क, समुद्री या हवाई रास्ते से भारत छोड़कर न जा सकें। इसके बावजूद अपनी पत्नी व बच्चों के साथ चकमा देकर वह अमेरिका चले गए। हमारा आशय यह नहीं है कि हेवुड आतंकवादी या अपराधी हैं, पर अब तक की जांच में उन्हें क्लीन चिट नहीं मिली थी। उनके पोलीग्राफ व ब्रैनमैपिंग टेस्ट नेगेटिव पाए गए, पर जांच पूरी होने से पहले उनकी फरारी गहन चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि यह मामला आतंकवाद जसी संगीन वारदात से जुड़ा है। इस बार में चूक दो स्तरों पर हुई नजर आती है। मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र की एटीएस हेवुड की जांच कर रहे थे, जिन्होंने उन पर आवश्यक निगरानी रखी होती तो उनका भाग निकलना रोका जा सकता था। उनका पासपोर्ट जब्त कर भी उन्हें जाने से रोकना संभव था। दूसरी, जब हेवुड के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया था तो दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर तैनात आव्रजन अधिकारियों ने उसे कैसे नजरअंदाज कर दिया? उनके कंप्यूटर पर उनके पासपोर्ट और वीसा विवरण जरूर डाले गए होंगे। इस तरह की फरारी कोई पहली घटना नहीं है। कुछ साल पहले रॉ का एक अफसर और बोफोर्स मामले में अभियुक्त क्वात्रोक्की इसी तरह हवाई मार्ग से जाने में कामयाब हुए थे। क्या इस तरह की गंभीर चूकों के लिए किसी की जवाबदेही नहीं? सिर्फ विभागीय जांच बिठाने या कुछ कर्मचारियों को दंडित करने से समस्या दूर नहीं हो सकती, बल्कि व्यवस्था को चाकचौबंद बनाना होगा। तभी हम आतंकवाद के खिलाफ कारगर कदम उठा सकते हैं।

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