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आजादी का सही अर्थ

यथासंभव सत्यपरक हो रामचन्द्र गुहा (इतिहासकार), का ‘कश्मीर की आग का पहला अध्याय’ शीर्षक लेख पढ़ा। मैं इतिहासकार नहीं लेकिन मेर जसे अनेक लोग इतिहास की घटनाओं के क्रम और स्वरूप को गहराई से समझते हैं। मैं वाद-विवाद में भी नहीं पड़ना चाहता हूं। मेरा आग्रह है कि निष्पक्ष स्रेतों से और कम से कम जम्मू ही जाकर, बचे वयोवृद्धों से मिलकर कश्मीर की घटनाओं, नेहरू की अपनी दबी हुई इच्छा, शेख अब्दुल्ला की वास्तविक महत्वाकांक्षा, जिससे नेहरू निश्चय ही अवगत रहे थे, और स्व. मौलाना आजाद साहब भी अवगत थे, इन सभी बातों की यथासंभव सत्यपरक व गहराई से जानकारी हासिल करने के बाद ही, कश्मीर की समस्या और उसके इतिहास पर लिखा जाए। विष्णु शंकर, पटना बाकी पर ध्यान दें अभिनव बिन्द्रा के पीछे उसे अपने परिवार से मिली विश्वस्तर की सुविधाएं हैं। ऐसे हाारों अन्य खिलाड़ी भी हैं, जिनका शोषण सरकारी स्तर पर होता है। विश्वस्तर की तो बात रहने दें, सामान्य जीवनयापन की सुविाधाएं भी नहीं हैं। कारपोरट सेक्टर को अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करना चाहिए। ओमप्रकाश त्रेहन, मुखर्जी नगर, दिल्ली कुंडली तो ठीक करंे ‘आजादी का नया साल’ शीर्षक में देश के बार में ज्योतिषीय नजरिया पढ़ा। परन्तु जो वर्ष प्रवेश (62) कुण्डली (14 अगस्त 2008, 15.18:58 बजे स्वतंत्र भारत का 62वां साल शुरू) दी गई है वह तो स्वतंत्र भारत के जन्म (15 अगस्त 1ी है न कि 62वें साल आरंभ की। यदि वर्ष प्रवेश की सही कुण्डली दी जाती तो ज्यादा ठीक रहता। सोमदत्त शर्मा, सराय रोहिल्ला, दिल्ली स्त्रियों केसम्मान की रक्षा हो खुफिया एजेंसी रॉ में निदेशक स्तर की महिला के साथ यौन-उत्पीड़न के मामले ने उच्च अधिकारियों की पोल खोल दी है। प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने महिला अधिकारी ने जहर खाकर जान देने की कोशिश की, उसे जल्द ही अस्पताल में भर्ती करवाया गया। यह पहली बार नहीं है जब ऊंचे ओहदे पर आसीन महिलाओं के साथ ऐसी घटना घटी हो। जब ऊंचे स्तर पर ही महिलाएं महफूा नहीं हैं तो औरों की परवाह किसे होगी। महिलाओं के साथ हो रही ऐसी घटनाओं पर केंद्र सरकार को अवश्य कदम उठाना होगा। रतन चंद पटियाल, हिम्मतगढ़, जीरकपुर

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