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जजों की संपत्ति को परदे में ही रखना चाहती है सरकार

सरकार नहीं चाहती कि लोगों को जजों की संपत्ति का ब्यौरा, उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों और उनकी नियुक्ितयों व तबादलों की वजह का पता चले। विधि एवं न्याय मंत्रालय ने दिल्ली हाईकोर्ट से कहा, ‘राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीशों जसे संवैधानिक पद सूचना के अधिकार के कानून के दायर में नहीं आते।’ जाहिर है कि इससे लोगों का सूचना के अधिकार का दायरा काफी सीमित हो जाएगा। कानून मंत्रालय ने यह बात केंद्रीय सूचना आयुक्त के आदेश को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कही। आयुक्त ने अपने आदेश में मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह आयोग को 2005-07 के दौरान हाईकोर्ट के न्यायधीशों के तबादलों से संबंधित फाइलों का अध्ययन करने दे। सरकार का यह ‘अप्रत्याशित’ रुख देश के मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन द्वारा हाल में सभी हाईकोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों को लिखे गए पत्र के मजमून के विपरीत नजर आता है। पत्र में मुख्य न्यायाधीशों से सुनिश्चित करने को कहा गया था कि न्यायाधीश अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करं। इस मामले में राजधानी के एक निवासी की ओर से पैरवी कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सरकार के इस ताजा रुख को चुनौती देते हुए कहा, ‘अगर सरकार की दलील को स्वीकार कर लिया जाता है तो इससे सूचना के अधिकार का कानून फिाूल का बनकर रह जाएगा। उस स्थिति में सीएजी, चुनाव आयोग सभी नौकरशाहों, मंत्रियों और सांसदों व विधायकों को भी इस कानून के दायर से बाहर रखना होगा।’ मंत्रालय का ताजा रवैया मंत्रालय पर संसदीय समिति के रुख के ठीक विपरीत है। समिति ने इस साल मई में संसद में रखी अपनी रिपोर्ट में कहा था, ‘न्यायिक फैसला करने की प्रकिया के अलावा न्यायिक प्रशासन की सभी गतिविधियां और उससे जुड़े सभी लोग सूचना के अधिकार के कानून के दायर में आते हैं।’

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  • Web Title: जजों की संपत्ति काब्यौराचाहती है सरकार