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कश्मीर का तांडव और बेबस सरकार

ाम्मू में लगभग दो माह से जारी उग्र आंदोलन और कश्मीर घाटी में जबर्दस्त ढंग से उभरी भारत-विरोधी भावनाएं भी केन्द्र सरकार की नींद तोड़ने में असफल रहे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अभी तक जम्मू-कश्मीर जाने की फुर्सत नहीं मिल पाई और गृहमंत्री शिवराज पाटिल समझ रहे हैं कि उनकी जिम्मेदारी केवल खोखली बयानबाजी करने तक ही सीमित है। सोमवार को श्रीनगर में संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षकों के दफ्तर जाने वाले जुलूस में जिस तरह से पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाए गए और पाकिस्तानी झंडे फहराए गए, उसके बाद कोई भी सरकार हाथ पर हाथ धर नहीं बैठी रह सकती थी। इससे भी ज्यादा हैरत इस बात पर है कि आज भी कश्मीर घाटी में लोग पाकिस्तान की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। वे ‘मेरी जान, तेरी जान-पाकिस्तान, पाकिस्तान’ और ‘जीवे-ाीवे पाकिस्तान’ के नार लगा रहे हैं और पाकिस्तान के झंडे फहरा रहे हैं। एक ऐसे समय जब पाकिस्तान स्वयं अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, और उसे पूरी दुनिया एक असफल राष्ट्र-राज्य मान रही है, कश्मीर के अलगाववादी अपना भविष्य उसके साथ जोड़ना चाहते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि अब उनका आंदोलन मुस्लिम सांप्रदायिकता से प्रेरित है। जब वे आजादी की बात करते हैं तो उससे उनका अभिप्राय भारत से आजादी हासिल करके पाकिस्तान के कब्जे वाले तथाकथित ‘आजाद कश्मीर’ से मिलना होता है। सोमवार को जब पाँच लाख लोगों का जुलूस संयुक्त राष्ट्र कार्यालय ज्ञापन देने जा रहा था, तब शायद उन्हें मालूम नहीं होगा कि आज से 57 साल पहले 1में भारत के 14 जाने-माने मुसलमानों ने इसी कार्यालय को एक ज्ञापन देकर कहा था कि यदि कश्मीर से हिंदुओं को निकालने का अभियान चलाया जाएगा तो फिर शेष भारत में मुसलमान कैसे सुरक्षित रह पाएंगे। ज्ञापन 14 अगस्त, 1ो संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि डॉ. फ्रैंकग्राहम को सौंपा गया था और इस पर हस्ताक्षर करने वालों में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. ज़्ााकिर हुसैन- जो बाद में देश के राष्ट्रपति भी बनें-, हैदराबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश सर इकबाल अहमद तथा गवर्नर जनरल की एक्ाीक्यूटिव कौंसिल के पूर्व सदस्य सर सुलतान अहमद भी शामिल थे। कश्मीर घाटी से चार लाख हिन्दुओं को निकालने के बाद भी कश्मीरियत और धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करने वाले कश्मीरी नेताओं ने उनकी इस आशंका को पुष्ट ही किया है। जम्मू में इस समय जिस प्रकार की उग्र और व्यापक हिंदू साम्प्रदायिकता का तांडव देखने में आ रहा है, उसके पीछे कश्मीर घाटी में उफान पर आई मुस्लिम साम्प्रदायिकता और पाकिस्तानियत भी एक बड़ा कारण है। कश्मीर समस्या के केन्द्र में तीन कारक हैं: पाकिस्तान का धार्मिक राष्ट्रवाद, भारत का धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद और कश्मीरियों का जातीय राष्ट्रवाद जिसे वे कश्मीरियत का नाम देते हैं। धर्म के नाम पर बने पाकिस्तान का मानना है कि मुस्लिम-बहुल राज्य होने के कारण देश के विभाजन के समय ही कश्मीर उसे मिल जाना चाहिए था। लेकिन पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने खुद इस सिद्धांत को जोर देकर मनवाया था कि किसी रियासत में रहने वाली जनता नहीं बल्कि उसका शासक यह तय करगा कि वह भारत में शामिल होना चाहता है या पाकिस्तान में। जम्मू-कश्मीर में न तो उसके शासक महाराजा हरिसिंह और न ही जनता के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला राज्य का पाकिस्तान में विलय चाहते थे। इसलिए शुरुआत में ही पाकिस्तान ने कश्मीर को बलपूर्वक हड़पने की कोशिश की। जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग को इसीलिए माना था क्योंकि उन्हें पता था कि जनता राज्य के पाकिस्तान में विलय के विरुद्ध है। यही कारण है कि पाकिस्तान ने कभी भी जनमत संग्रह कराने के लिए सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों में निहित शर्तो को पूरा नहीं किया क्योंकि उसे अपने जीतने का बिल्कुल भी भरोसा नहीं था। भारत के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद को पाकिस्तान के मुस्लिम राष्ट्रवाद की ओर से तो चुनौती मिलती ही है, उसे हिंदू राष्ट्रवाद या साम्प्रदायिकता का भी लगातार सामना करना पड़ता है। भारतीय संघ में एक मुस्लिम-बहुल राज्य की उपस्थिति धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क है। वह भारत के राष्ट्रवाद की आधारशिला है। लेकिन समस्या यह है कि महाराजा हरिसिंह ने जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय करने में देरी इसीलिए की क्योंकि उन्हें यह खुशफहमी थी कि वह अपने राज्य को स्विटारलैंड की तरह का स्वाधीन राष्ट्र बना सकते हैं जो भारत और पाकिस्तान के बीच तटस्थ बन कर रहेगा। शेख अब्दुल्ला अंत तक यह स्वप्न छोड़ नहीं पाए। फारूक अब्दुल्ला हालांकि यह कहते हैं कि कश्मीर कभी भी स्वाधीन देश के रूप में टिक नहीं पाएगा, पर वक्त के मुताबिक उनका सुर भी बदलता रहता है। हाल ही में उन्होंने बयान दिया कि जम्मू की घटनाओं से वह इतने उद्विग्न हुए कि अपने पिता की कब्र पर जाकर सोचते रहे कि क्या हमने सही फैसला लिया था, यानी क्या जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को स्वीकार करना सही था? फारूक अब्दुल्ला ऐसे बयान देकर प्रकारांतर से विलय को फिर से विवादास्पद बना देते हैं। जहां सैयद अली शाह गिलानी जसे अलगाववादी नेता स्पष्ट शब्दों में विलय को अस्वीकार करते हैं, वहीं फारूक अब्दुल्ला जसे राष्ट्रवादी नेता भी वक्त की जरूरत के मुताबिक इस अध्याय को खोलते और बंद करते रहते हैं। यानी उनकी पूरी कोशिश रहती है कि इस प्रश्न पर अस्पष्टता बनी रहे। लेकिन शेख अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला या शब्बीर शाह का आजादी का स्वप्न सांप्रदायिक सोच पर आधारित नहीं है। चिंता की बात यह है कि इस समय कश्मीर में इस्लामी कट्टरपंथी और उग्रवादी नेता तथा संगठन हावी हो चले हैं। पूर्व राज्यपाल जनरल एस. के. सिन्हा के कुछ फैसलों से ऐसी ताकतों को बल मिला है। पहले उन्होंने एक हिन्दू विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव किया। जब इसके जवाब में मुस्लिम विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव आया तो उन्हें उसे मानना पड़ा जबकि प्रस्ताव अहले हदीस नामक उस संगठन की ओर से आया था जिसकी पाकिस्तान शाखा ने लश्कर तैयबा को जन्म दिया है। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य को धार्मिक अध्ययन के लिए विश्वविद्यालय खोलने की क्या जरूरत है, समझना मुश्किल है। जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों को शुरू से ही शिकायत रही है कि उनकी जरूरतों को अनदेखा किया जाता है और राज्य की राजनीति एवं प्रशासन कश्मीर घाटी के नियंत्रण में रहते हैं। शायद अब समय आ गया है जब जम्मू, कश्मीर और लद्दाख को स्वशासित क्षेत्र बना कर स्वायत्तता दे दी जाए ताकि वे अपने-अपने हितों का खुद ख्याल रख सकें। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।ं

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