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पहले नहीं दिखा एसा सस्पेंस

महीने छह दिन पुरानी कोड़ा सरकार ने आखिरकार इस्तीफा दे दिया। दिल्ली से लौटने पर कोड़ा ने जो कुछ कहा उसके मुताबिक उनके पास यही विकल्प था। इसके साथ ही कुर्सी के किस्से में एक और किस्सा जुड़ गया। सूबे में सत्ता पलट तो कई दफा हुआ पर ऐसा सस्पेंस और तीखापन कभी नहीं रहा। दिल्ली दरबार निर्दलीयों को मनाने-झुकाने में विफल रहा। कमलेश सिंह, बंधु तिर्की और एनोस एक्का को छोड़ सभी छह निर्दलीय शिबू सोरन को समर्थन देने के मूड में नहीं दिख रहे। निर्दलीयों ने यहां तक कहा है कि अब नयी परिस्थितियों में नये सिर से तानाबाना बुना जायेगा। दिलचस्प यह भी है कि सत्ता पलट की मुहिम अमूमन अगस्त महीने में ही शुरू होती रही है। भले ही फलक पर इसका असर छह महीने बाद दिखा हो।ड्ढr 2003 में बाबूलाल को छोड़नी पड़ी थी कुर्सीड्ढr मार्च 2003 में बाबूलाल मरांडी के खिलाफ समता- जदयू के पांच तथा दो निर्दलीय विधायकों ने बगावत कर दी थी। तब भी तख्ता पलट की मुहिम छह महीने पहले से चल रही थी। विस के बजट सत्र में लालचंद महतो, मधु सिंह, रमेश सिंह मुंडा, जलेश्वर महतो तथा समरश सिंह , जोबा मांझी विपक्ष की तरफ जा बैठे थे। निर्दलीय में सुदेश तथा समता से रामचंद्र केसरी नहीं डिगे थे। 16 मार्च को ये मंत्री विपक्ष (कांग्रेस- झामुमो- राजद) के साथ नया राजनीतिक ताना बाना बुनने लगे। सभी एक साथ बुंडू चले गये। भारी राजनीतिक ड्रामा हुआ। भाजपा के शीर्ष नेता सत्ता बचाने के लिए रांची पहुंचे। 17 मार्च को बाबूलाल मरांडी ने इस्तीफा दे दिया। एनडीए के हाथ से सत्ता नहीं निकली। विपक्ष के पाले में जाते-ााते समता-ादयू विधायकों के पैर ठिठके। नेतृत्व परिवर्तन पर राजी हो गये। इसके बाद अजरुन मुंडा की सरकार बनी।ड्ढr 2005 में अजरुन मुंडा ने पलटा था पासाड्ढr 2005 में शिबू सोरन की सरकार बनी। लेकिन वह बहुमत साबित नहीं कर सके। नौ दिनी शिबू सोरन की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। सत्ता संघर्ष तथा जोड़-तोड़ का खेल इतना दिलचस्प था कि सुदेश महतो पांच निर्दलीयों की अगुवाई करते हुए गुपचुप ढंग से बारास्ता भुवनेश्वर जयपुर पहुंच गये। निर्दलीय हरिनारायण राय तथा मधु कोड़ा को यूपीए के पाले से ऐन मौके पर एनडीए के पाले में कर लिया गया। सत्ता संघर्ष के हीरो सुदेश महतो बने थे। इसके बाद भाजपा-ादयू विधायक भी जयपुर चले गये। जयपुर से दिल्ली गये और राष्ट्रपति के पास परड की। लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह ने इस मुहिम की कमान संभाली। भाजपा जदयू तथा निर्दलीय एक साथ रांची पहुंचे। होटल अशोक से एक साथ बस पर सवार विस पहुंचे। बहुमत साबित किया। फिर अजरुन मुंडा सत्ता पर काबिज हुए।ड्ढr 2006 में कोड़ा ने चलायी थी तख्ता पलट की मुहिमड्ढr अगस्त महीने की बात है। विपक्ष में बैठे बंधु तिर्की तथा भानूप्रताप शाही ने मधु कोड़ा एंड टीम से संपर्क बढ़ाया। एनोस एक्का, हरिनारायण राय के साथ गुपचुप दिल्ली गये। कांग्रेस के साथ खिचड़ी पकायी। इसके बाद सितंबर में कोड़ा, एक्का तथा राय ने मुंडा सरकार से इस्तीफा दे दिया। फिर यूपीए के सभी विधायकों के साथ ये निर्दलीय केरल की यात्रा पर निकल गये। दिल्ली में सरकार बनाने का प्लॉट तय किया गया। शिबू सोरन को कन्फीडेंस में लिया गया। लालू प्रसाद, प्रियरांन दास मुंशी, प्रणव मुखर्जी सरीखे नेताओं ने ऑपरशन सत्ता की कमान संभाली। सभी 42 विधायकों को एक साथ दिल्ली-मुंबई से रांची लाया गया। इस बीच कमलेश सिंह भी यूपीए की ओर सरक गये। मधु कोड़ा की 17 सितंबर को ताजपोशी हुई। इसके बाद एनडीए खेमा से चंद्रप्रकाश चौधरी भी सरकार में शामिल हो गये।ड्ढr 2008 में शिबू ने राज्य की राजनीति में ला दी तपिशड्ढr 22 जुलाई को केंद्र में यूपीए की सरकार को समर्थन देने के बाद ही झामुमो तथा शिबू सोरन ने सीएम की कुर्सी के लिए मुहिम शुरू कर दी। धीर- धीर यह मामला रंग पकड़ने लगा। रांची से लेकर दिल्ली तक सत्ता में खदबादहट हो गयी। 17 अगस्त को झामुमो ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। कांग्रेस-राजद ने शिबू को समर्थन देने की पेशकश की। इधर निर्दलीय कोड़ा के समर्थन में टाइट हो गये। स्टीफन मरांडी ने मिशन पर काम किया। यूपीए को भी इसका अंदाजा नहीं था कि निर्दलीय इतने सख्त हो जायेंगे। कमलेश सिंह, बंधु तिर्की और एनोस एक्का को छोड़ कोई भी नहीं डिगा। शनिवार को कोड़ा ने इस्तीफा दे दिया। निर्दलीयों के रुख से यूपीए के माथे पर भी बल पड़े हैं। कोड़ा के इस्तीफा के बाद राजद-कांग्रेस ने झामुमो को समर्थन देने पर राामंदी जतायी है।

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