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निर्णायक दौर में डील

विएना में न्यूक्िलयर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) की बेनतीजा बैठक के बाद तीन बातें साफ तौर पर उभरी हैं। एक, चूंकि एनएसजी में किसी भी प्रस्ताव को पास करने के लिए सर्वसम्मति अनिवार्य है, इंडो-यूएस डील के मसौदे से असंतुष्ट सदस्य देशों का मान रखने के लिए मसौदे में संशोधन करने ही होंगे। दो, ये संशोधन मध्यमार्गी और छिटपुट किस्म के ही होने हैं। इस बात को साउथ ब्लॉक के साथ-साथ व्हाइट हाउस के अधिकारी भी अच्छी तरह समझते हैं कि भारत के मौजूदा राजनीतिक समीकरण मसौदे में किसी बड़े फेरबदल की इजाजत नहीं देते। तीसरी और सबसे अहम बात यह है कि एटमी डील की गेंद अब भारत के नहीं,अमेरिका के पाले में है। अब यह उसी की जिम्मेदारी है कि वह संधि के 2005 वाले मूल प्रारूप में भारत से किए गए वादे को निभाते हुए एनएसजी के कोपभवनों में बैठे अपने मित्र राष्ट्रों को समझाए और मनाए। यह अमेरिकी होमवर्क की कमी का ही नतीजा था कि एनएसजी की बैठक में एटमी डील को हरी झंडी नहीं दिखाई जा सकी। वरना कोई वजह नहीं थी कि जब दुनिया के सबसे ताकतवर एटमी राष्ट्र की कूटनीतिज्ञ बिरादरी लोकतांत्रिक भारत के जिम्मेदार परमाणु इतिहास की कायल है तो न्यूजीलैंड, नाव्रे या कनाडा की राजनयिक बिरादरी में कोई शक बचा रहता। न्यूक्िलयर क्लब का सबसे हैवीवेट मेंबर होने के नाते बुश एंड पार्टी का यह कूटनीतिक उत्तरदायित्व था कि बाकी मेंबरों को वह जरा तरीके से समझाती कि एनएसजी में एपीटी, सीटीबीटी, यूरेनियम संवर्धन या परमाणु परीक्षण सरीखे जिन मुद्दों पर शिकवे जताए जा रहे हैं, उन पर भारत की बाकायदा एक घोषित और दशकों पुरानी परमाणु नीति है और उसमें जितना लचीलापन संभव था, भारत उतना दिखा चुका है। होमवर्क की यह कमी अब दोनों मुल्कों को महीनों का काम हफ्तों में करने के लिए मजबूर करेगी, क्योंकि 4-5 सितंबर को एनएसजी की अगली बैठक तक अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग को यह दौड़भाग पूरी करनी ही होगी क्योंकि तकनीकी तौर पर सितंबर के सत्र के बाद तक इस डील को अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी मिलना नामुमकिन हो जाएगा। उम्मीद है आज जब विदेश सचिव मेनन वाशिंगटन में उपविदेश मंत्री विलियम बर्न्‍स से और इधर नई दिल्ली में सहायक विदेश मंत्री रिचर्ड बाउचर साउथ ब्लॉक के कर्ताधर्ताओं से मंत्रणा करेंगे तो अगले पखवाड़े के लिए एक ठोस रणनीति उभरेगी।

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