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पूर्वी कोसी के टूटे तटबंध की मरम्मत की कसरत शुरू

नेपाल क्षेत्र में टूटे पूर्वी कोसी तटबंध की मरम्मत की कसरत शुरू कर दी गई है। देश के विख्यात बाढ़ विशेषज्ञ नीलेन्दु सान्याल की अध्यक्षता में गठित कमेटी के सुझावों पर अमल करते हुए जल संसाधन विभाग ने कोसी के तटबंध को पुराने स्वरूप में लाने की कार्रवाई प्रारंभ कर दी। देश की बड़ी एजेंसी ‘हिन्दुस्तान स्टील वक्र्स कंस्ट्रक्शन लिमिटेड’ और ‘साईं एंजीकॉन एंड कंस्ट्रक्शन लिमिटेड’ को इसकी जिम्मेवारी सौंपी गई है।ड्ढr ड्ढr यह एजेंसी बिहार में बागमती परियोजना पर भी काम कर रही है। तटबंध तक जाने के लिए एप्रोच रोड बनाने और अन्य सुविधा मुहैया कराने के लिए रविवार को जमीन पर काम शुरू हो गया। राज्य सरकार ने नेपाल से इसके लिए सहयोग मांगा है। इसके लिए काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के माध्यम से नेपाल सरकार से निर्माण कार्य की अनुमति मांगी है। निर्माण सामग्रियों को सीमा के निकट ले जाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। बिहार ने अपनी तैयारी पूरी कर ली है और नेपाल से सुरक्षा की हरी झंडी मिलते ही तटबंध पर काम शुरू हो जाएगा।ड्ढr राज्य सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती कोसी नदी को मूल स्वरूप में लाने की है। खासकर वीरपुर से कुरसेला के बीच कोसी की धारा पूरी तरह मार्ग से भटक चुकी है। उसे मूल मार्ग में लाने के लिए कार्ययोजना तैयार की गई है और उसपर अमल किया जा रहा है। इसके लिए सबसे पहले पाइलट चैनल बनाकर पानी निकाला जाएगा। इसी क्रम में जहां से नदी की धारा बदली है वहां उसे पूर्व राह में लाने की कसरत होगी। उधर रविवार को श्री सान्याल और अन्य तकनीक विशेषज्ञों ने टूटे तटबंध के साथ-साथ बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। उन्होंने तटबंध के टूटने की संपूर्ण स्थिति का निकट से अध्ययन किया। जब तक पानी रहेगा तब तक राहत शिविरड्ढr पटना (हि.ब्यू.)। सरकार को पता है कि इस बार बाढ़ राहत का मामला महीने-दो महीने में निपटने वाला नहीं है। लिहाजा वह राहत और बचाव की लम्बी तैयारी में जुटी है। आपदा प्रबंधन विभाग के अपर आयुक्त प्रत्यय अमृत ने कहा- कोसी अक्तूबर में अपने चरम पर आती है। लिहाजा हम भी राहत शिविर तब तक चलाएंगे जब तक उस इलाके में बाढ़ का पानी रहेगा। हम लम्बी लड़ाई की तैयारी में हैं। श्री अमृत रविवार को संवाददाता सम्मेलन को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि मधेपुरा जिले में ग्वालपाड़ा प्रखंड के शाहपुर गांव में बाढ़ से दो बच्चियों की मौत हुई है। उन्होंने कहा कि इस बार बाढ़ उस इलाके में आई है जहां आने की उम्मीद नहीं थी। लिहाजा यह सामान्य बाढ़ नहीं है। राज्य सरकार की प्राथमिकता बाढ़ में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की है। सुपौल, अररिया और मधेपुरा में 150 नाव व 23 मोटरबोट लगाए गए हैं। एनडीआरएफ के 235, सैप के 400 और बिहार पुलिस के तीन सौ जवानों को इस काम में लगाया गया है। लोगों को रडियो से ऊंचे स्थानों के बार में बताया जा रहा है। सुपौल में 13, मधेपुरा में 37 और अररिया में 11 राहत शिविर चलाए जा रहे हैं। वायु सेना के तीन हेलीकाप्टर चूनापुर हवाई अड्डा से नियमित उड़ान भर रहे हैं। तीनों जिलों में अब तक 10 हाार 0 फुड पैकेट विभिन्न गांवों में गिराये जा चुके हैं। उन्होंने बताया कि तीनों जिलों में 168 पंचायतों के 10.47 लाख लोग प्रभावित हैं। संवाददाता सम्मेलन में गृह विभाग के विशेष सचिव पी.एन. राय भी मौजूद थे। कोसी फिर ‘बिहार की शोक’ साबितपटना (हि.ब्यू.)। कोसी नदी ने अपने कहर से एक बार फिर प्रमाणित कर दिया है कि वह वास्तविक रूप में ‘बिहार की शोक’ है। कोसी पर बने तटबंध और उसकी धाराओं को नियंत्रित करने में मिली सफलता के बाद इसे बिहार के शोक की पहचान से मुक्ित मिल गई थी, लेकिन पिछले दिनों जिस तरह कोसी नदी ने कोसी और पूर्णिया प्रमंडल में तबाही मचाई है उससे उसका पुराना तेवर सामने आ गया है। अपनी धारा बदलने के लिए कुख्यात रही कोसी ने तमाम कोशिशों को एक बार फिर गच्चा दे दिया और जमकर तांडव मचाया। नेपाल क्षेत्र में तटबंध के टूटने के बाद सुपौल, मधेपुरा, अररिया, सहरसा और पूर्णिया आदि जिलों में कोसी ने जहां चाहा अपनी धारा मोड़ दी।ड्ढr ड्ढr कोसी नदी को बांधने के बाद कोसी और पूर्णिया के लोग बाढ़ को लगभग भूल चुके थे। हल्की बाढ़ यदा-कदा आती रही, लेकिन वर्ष 1में आई प्रलयंकारी बाढ़ के बाद ऐसी विभीषिका क्षेत्र के लोगों ने कभी नहीं झेली। 50 वर्षो की लंबी यात्रा के बाद क्षेत्र के लोग कोसी के सामने एक बार फिर से लाचार और विवश हो गए हैं। उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा कि करं तो क्या? बाढ़ की कोई तैयारी भी नहीं थी। क्षेत्र के लोग भी बाढ़ से बचने के लिए ‘मन’ से तैयार नहीं थे। ऐसे में बाढ़ का कहर अधिक भारी पड़ गया। मकान, सड़क, पुल-पुलियों, सरकारी भवन आदि को तबाह करने के साथ-साथ पानी से लाखों हेक्टेयर खेतों को रौंद डाला है। सूबे के तीन मंत्री वहां अलग-अलग जिलों में कैम्प किए हुए हैं, लेकिन सरकार का हर प्रयास इस समय नाकाफी है। बाढ़ से लड़ने की सारी तैयारी पर पहली बार ‘कोसी’ भारी पड़ गई।ं

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