अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

उर्दू के विकास में अपने ही बाधक

उर्दू के विकास में अपने ही रोड़े बने हुए हैं। इसके विकास में प्रमंडल से प्रखंड स्तर तक के कार्यालयों की कार्यशैली, उर्दू पद पर बहाल कर्मी, आम उर्दू के जानकार, राजभाषा विभाग की उदासीनता बाधा बने हुए हैं। हालत यह है कि कार्यालय में लोग उर्दू में आवेदन देना शर्म की बात समझते हैं। अधिकारियों की नीति भी इस मामले में साफ नहीं हैं। बिहार स्टेट राजभाषा उर्दू मुलाजमीन यूनियन (कर्मचारी संघ) की द्वितीय प्रतिनिधि सभा में वक्ताओं ने ये बातें कहीं।ड्ढr ड्ढr रविवार को पंचायत परिषद में आयोजित सभा की अध्यक्षता करते हुए संघ के प्रदेश अध्यक्ष सैयद मुबारक हुसैन ने कहा कि उर्दू पद पर बहाल उर्दू अनुवादक, सहायक अनुवादक, टंकण आदि से कार्यालय में उनके पद के अनुसार काम नहीं लिया जाता है। अधिकारी भी इस मामले में सख्ती नहीं बरतते हैं। आम लोग भी बच्चे को उर्दू पढ़ाने में कोताही करते हैं। इस अवसर पर जिला से प्रखंड स्तर पर मुबारक ने लगभग 50 कर्मियों को उर्दू के विकास में लगने तथा उसकी समीक्षा करने की जिम्मेवारी दी। उर्दू के विकास में योगदान देने वाले दो गैर उर्दू भाषी लोगों को संघ की ओर से सम्मनित भी किया गया। इनमें राजभाषा के पूर्व उप निदेशक गंगाधर प्रसाद श्रीवास्तव व विश्वमोहन प्रसाद वर्मा शामिल हैं।ड्ढr ड्ढr मुख्य अतिथि फखरुद्दीन आरफी ने कहा कि सूबे में उर्दू के विकास के लिए मुजाहिद बनना होगा। लोग हिन्दी तथा अंग्रेजी अखबार तो ड्राइंग रूम में रखते हैं पर उर्दू अखबार रखना पसंद नहीं करते। इस मौके पर मुजाहिदुल इस्लाम, फरहत जहां, हलीमा बेगम सहित कई लोगों ने अपने विचार रखे। मंच संचालन खुर्शीद अनवर ने तथा धन्यवाद ज्ञापन फिरो अहमद ने किया। सभा में सूबे के सभी 38 जिलों से उर्दू कर्मियों ने सैकड़ों की तादाद में शिरकत की।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: उर्दू के विकास में अपने ही बाधक