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उड़ीसा में आग

वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या और प्रतिक्रिया में हुई हिंसक घटनाएं, उड़ीसा को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने का प्रयास ही कही जाएंगी। गरीबी और अशिक्षा में जकड़े इस पिछड़े राज्य की दलित और आदिवासी आबादी को धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनाने का काम बरसों से चल रहा है। लालच अथवा जबरन धर्मातरण की जांच के लिए गठित नियोगी आयोग की रिपोर्ट के बाद कांग्रेस ने 41 वर्ष पहले उड़ीसा धार्मिक स्वतंत्रता कानून बनाया लेकिन इसके बाद भी धर्मातरण पर अंकुश नहीं लग पाया। आंकड़े इसके गवाह हैं। कंधमाल जिले में, जहां स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या हुई, 1ी जनगणना में ईसाई आबादी केवल छह प्रतिशत थी जो 2001 में बढ़कर 27 प्रतिशत पहुंच गई। इस इलाके में तीन चौथाई लोग गरीबी की रखा से नीचे हैं। मतलब साफ है कि निरक्षर व गरीब जनता को सब्जबाग दिखाकर धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। स्वामी लक्ष्मणानंद विश्व हिन्दू परिषद के केन्द्रीय मार्गदर्शक मंडल के महत्वपूर्ण सदस्य थे और वर्षों से धर्मातरण को रोकने की मुहिम में जुटे थे। राज्य सरकार ने उनकी हत्या का दोष माओवादियों के मत्थे मढ़ने का प्रयास किया है, जिसे स्वीकार करना कठिन है। यूं भी जब उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को इस हत्या की जांच का काम सौंप दिया गया, तब पहले से ही माओवादियों को हत्यारा ठहराने का क्या औचित्य है? स्वामी लक्ष्मणानंद पर पहले भी जानलेवा हमले हो चुके हैं। हत्या के बाद राज्य सरकार व स्थानीय प्रशासन कहीं अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास तो नहीं कर रहे? उड़ीसा में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं, ऐसे में इस हत्या की आड़ में राजनीति की कुटिल चालें चली जा रही हैं। राज्य में पिछले दस वर्ष से नवीन पटनायक के नेतृत्व में बीजू जनता दल व भाजपा की सरकार है। स्वामीजी की हत्या के बाद भाजपा के कट्टर धड़े ने मुख्यमंत्री पर सीधा हमला बोल दिया है। खेदजनक यह, कि राज्य में साम्प्रदायिक सौहार्द का वातावरण बनाने के बजाय कांग्रेसी भी आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। पैसे के लालच अथवा तलवार की नोक पर कराया जाने वाला धर्मातरण गैरकानूनी ही नहीं अनैतिक भी है। अच्छा हो समझदार हिन्दू और ईसाई नेता जनता से शांति बनाए रखने की अपील करं। धर्मातरण कराने वाले सभी तरह के संगठनों से कड़ाई से निपटना अब जरूरी हो गया है।ंं

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