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कोर्ट के बाहर दिया बयान भी काफी

एक्स्ट्रा ज्यूडीशियल कंफेशन यानी कोर्ट के बाहर सामान्य जनता के बीच में दिए गए इकबालिया बयान सजा देने का आधार बन सकते हैं। ऐसे बयानों को यह मानकर खारिा नहीं किया जा सकता कि ये कमजोर बयान हैं। स्वेच्छा और बिना किसी दबाव के दिए गए बयानों की उच्चतम विश्वसनीयता होती है। क्योंकि यह माना जाता है कि अभियुक्त ऐसे बयान आत्मग्लानि की उच्चतम भावना के कारण देता है। जस्टिस अरिाित पसायत और एम के शर्मा की खंडपीठ ने यह व्यवस्था देते हुए पत्नी व मासूम बेटी के हत्यार पिता-पुत्र को कोर्ट के बाहर दिए इकबालिया बयानों के आधार पर मिली सजा पर अपनी मुहर लगा दी। खंडपीठ ने कहा कि कोर्ट के बाहर दिए गए इकबालिया बयान को स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन इन्हें विश्वसनीयता की कड़ी कसौटी पर कसना आवश्यक है। यदि अभियुक्त सही मानसिक स्थिति, बिना किसी दबाव, डर और स्वेच्छा से बयान देते हैं तो उन्हें कोर्ट में स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन जरूरी है कि इनकी पर्याप्त पुष्टि की जाए। रोहतक के इस मामले में दोनों के खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के अलावा कोई सीधा सबूत नहीं था। लेकिन सरपंच के सामने पिता-पुत्र ने यह स्वीकार किया था कि पत्नी गुड्डी और बेटी पूनम को इसलिए मारना पड़ा क्योंकि गुड्डी के किसी और से अवैघ संबंध थे। पूनम इन्हीं अवैध संबंधों का नतीजा थी। इसलिए ऐसे कलंक को परिवार के साथ रखना संभव नहीं था। यह खुलासा उन्होंने सरपंच से भी किया था। इसके बाद पिता ने महिला दक्षता समिति के सचिव से भी कहा इस बात को स्वीकारा।

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