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गुरुचाी ने संभाली झारखंड की कमान

रांची के एतिहासिक मोरहाबादी मैदान में बुधवार को झारखंड मुक्ित मोर्चा के प्रमुख शिबू सोरन ने झारखंड के छठे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। उनके साथ कैबिनेट के 11 मंत्रियों को भी राज्यपाल सैयद सिब्ते राी ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलायी। निरसा (धनबाद) से फारवर्ड ब्लॉक के टिकट पर चुनी गयीं अपर्णा सेनगुप्ता ने पहली बार कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली। अपर्णा को छोड़कर बाकी सभी मंत्री पूर्ववर्ती कोड़ा सरकार में रह चुके हैं। स्टीफन मरांडी, सुधीर महतो, जोबा मांझी, नलिन सोरन, दुलाल भुइयां, बंधु तिर्की, भानू प्रताप शाही, हरिनारायण राय, एनोस एक्का और कमलेश कुमार सिंह शपथ लेनेवाले अन्य कैबिनेट मंत्री हैं।ड्ढr ड्ढr ढोल-नगाड़ा और पारंपरिक गाजे-बाजे के बीच राजधानी के अलावा बड़ी संख्या में राज्य के विभिन्न इलाकों से आये लोग इस समारोह के गवाह बने। कार्यकर्ताओं के हाथ में झामुमो का चुनाव चिन्ह धीर-धनुष भी था। समारोह के बीच में रह-रहकर शिबू सोरन और झामुमो के जयकार लग रहे थे। समारोह में सूबे की पहली महिला चांद फरहाना, विधानसभा के स्पीकर आलमगीर आलम, केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय, सांसद टेकलाल महतो, धीरंद्र अग्रवाल, पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, मुख्यमंत्री शिबू सोरन की पत्नी रूपी सोरन, कार्डिनल तेलस्फोर पी टोप्पो के अलावा झामुमो और राजद के विधायक और नेता शामिल हुए। कांग्रेस विधायकों ने समारोह से अपने को अलग रखा। विपक्ष के नेताओं ने भी शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा नहीं लिया।ड्ढr ड्ढr शपथ ग्रहण समारोह तकरीबन 35 मिनट तक चला। दोपहर 3.35 बजे शुरू हुआ और चार बजकर 10 मिनट पर खत्म हो गया। ढोल-नगाड़े और जय झारखंड की जय-ायकार के बीच शपथ ग्रहण समारोह में चला। बाहर से आये हुए झामुमो के कार्यकर्ता और नेता खासे उत्साहित थे। खासकर झारखंड छात्र युवा मोर्चा के युवा कार्यकर्ता रह-रहकर जयकार लगा रहे थे। मुख्य मंच के ठीके सामने बनी शहीद बेदी के समक्ष जाकर नेताओं ने झारखंड आंदोलन के शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। समारोह में टाना भगत समुदाय के लोगों ने विशेष रूप से हिस्सा लिया। समारोह शुरू होने के बहुत पहले वे पहुंचे और समाप्त होने के पहले ही धीर-धीर निकल गये। ..पर इनकी वजीरी रही सलामतड्ढr रांची (वार्ता)। झारखंड ने अलग राज्य गठन के बाद लगभग छह मुख्यमंत्री देखे लेकिन राज्य में निर्दलीय विधायकों की एक ऐसी जमात है जो कभी विपक्ष में बैठी ही नहीं। सूबे की कमान राजग के हाथ में हो या संप्रग के, इन्हें अब तक कोई फर्क नहीं पड़ा। राजग शासन काल में जी-5 के नाम से मशहूर और संप्रग शासन काल में हम-सात का झुकाव हमेशा से सत्ता की ओर ही रहा है। चाहे वह मांडर के विधायक बंधु तिर्की हो या जरमुंडी के हरिनारायण राय या फिर कोलिबेरा के एनोस एक्का। पूर्व मुख्यमंत्री और जगन्नाथपुर से चुनकर आए मधु कोड़ा को राज्य के प्रथम विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुई निर्दलीय की पूछ का सीधा फायदा मिला। वर्ष 2005 से अब तक सरकार द्वारा प्रकाशित झारखंड डायरी के पन्नों को पलटे तो सूबे के मुखिया के नाम बदलते रहे हैं। कभी अजरुन मुंंडा तो कभी मधु कोड़ा लेकिन हर नए कैबिनेट में इन निर्दलीय विधायकों के नाम शामिल हैं। विधानसभा में इन निर्दलीय विधायकों ने विपक्ष की तरफ बैठने की कभी जहमत नहीं उठाई। हर सरकार को अपना समर्थन देने के लिए इन निर्दलीय विधायकों के पास जायज वजह और मुक्कमल मुद्दे होते हैं। राज्य गठन के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव के बाद बनी भाजपा नीत अजरुन मुंडा सरकार के प्रति अपनी वफादारी निभाने के लिए इन विधायकों का समूह झारखंड से राजस्थान तक गया। इतना ही नहीं इन्होंने अजमेरशरीफ में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में चादर चढ़ाकर मुंडा सरकार की लंबी उम्र की कामना भी की। जब इन्हें लगा कि राजग गठबंधन इनके विकास मानक पर खरा नहीं उतर रहा तब इन्होंने उससे नाता तोड़कर भारतीय राजनीति के इतिहास में तीसरे निर्दलीय मुख्यमंत्री के रूप में मधु कोड़ा का नाम जोड़ दिया।ड्ढr ड्ढr हालांकि कोड़ा को इन विधायकों के समर्थन से लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस में सबसे लंबे समय तक निर्दलीय मुख्यमंत्री रहने का खिताब तो मिला लेकिन इन्हीं माननीयों की वजह से कोड़ा को सत्ता छोड़नी पड़ी। उल्लेखनीय है कि झारखंड के अलावा मेघालय और उड़ीसा में भी निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री पद संभाल चुके हैं। झामुमो द्वारा कोड़ा सरकार से समर्थन वापसी के बाद इन निर्दलीयों ने हम सात साथ हैं का नारा देकर एकबारगी शिबू सोरेन के मुख्यमंत्री बनने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया और बाद में सभी राजनीतिक मूल्यों को ताक पर रखते हुए उनके साथ हो गए। लगभग दस दिनों तक राजनीतिक उठा पटक के बाद जब सोरेन ने मुख्यमंत्री पद की दावेदारी की तो ये निर्दलीय गुरुजी के साथ कदम से कदम मिलाकर उनकी सरकार की शोभा बढ़ाने राजभवन तक जा पहुंचे। केन्द्र और राज्य में सरकार बचाने और गिराने में राजनीतिक पार्टियों की अहम भूमिका होती है लेकिन झारखंड में इन निर्दलियों ने यह साबित कर दिया है कि सूबे के मुखिया के घर तीन कांके रोड तक जाने वाली हर सड़क उनके घर से ही होकर गुजरती है।

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