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दो टूक

इस साल बिहार में बाढ़ नहीं, प्रलय है। बड़े नेता हवाई दौरे कर रहे हैं। छोटे मोटरबोट -नाव या अन्य साधनों से जहां तक जा सकते हैं, हालात का जायजा ले रहे हैं। सेना भी बचाव में लगी है। लेकिन, सुदूरवर्ती क्षेत्रों में लाखों लोग चारों ओर से पानी से घिरे हुए हैं। करीब डेढ़ सप्ताह से ये लोग सूखी जमीन देखने को तरस रहे हैं। इन तक न कोई नेता पहुंचा है, न मदद। मकानों की छतों पर लदे, पेड़ों के तनों पर लटके ये डूबते लोग तिनके का सहारा तलाश रहे हैं। इन्हें सिर्फ जीने की अदम्य इच्छा ही जिंदा रखे है। मौत से इनका फासला रो कम होता जा रहा है। इन्हें अविलंब राहत की दरकार है। वरना कहीं ऐसा न हो कि मदद मिलते- मिलते जिंदगी हार जाये।

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