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गुरु के सपने को किया साकार

अंतरराष्ट्रीय और 312 राष्ट्रीय पदक। यह है बॉक्िसंग के द्रोणाचार्य की सफलता की कहानी। न घर की परवाह की और न ही समाज की। खुद का सबकुछ बॉक्िसंग को समर्पित कर दिया कोच जगदीश सिंह ने। उनकी इसी मेहनत का नतीजा है कि आज उन्हें हर तरफ से सम्मानित किया जा रहा है। आज उनके भिवानी बॉक्िसंग सेंटर (बीबीसी) को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल चुकी है। कोच साहब शुरू से ही कहते रहे हैं कि बॉक्िसंग में ओलंपिक का पहला मैडल उनके भिवानी सेंटर से ही आएगा। अब उनकी यह तमन्ना भी पूरी हो चुकी है। उन्हीं के सेंटर के विजेन्दर कुमार ने पहला ओलंपिक पदक जीत लिया है। कोच को आज राष्ट्रपति ने द्रोणाचार्य अवार्ड से भी सम्मानित किया। इतना ही नहीं कल उन्हें हरियाणा सरकार भी 25 लाख रुपए देकर सम्मानित करने जा रही है। कोच जगदीश सिंह ने भिवानी के घर-घर में बॉक्िसंग का जुनून पैदा किया। बीबीसी में भिवानी ही नहीं उसके आस-पास के इलाकों के सैकड़ों बच्चे बॉक्िसंग सीखने आते हैं। यही कारण है कि आज इस सेंटर को मिनी क्यूबा तक का दर्जा मिल गया है। कहते हैं, हरियाणा के पहले बॉक्िसंग कोच राजेन्द्र सिंह यादव और हवा सिंह ने मुझे जो जिम्मेदारी सौंपी थी, मुझे लगता है कि मैंने उसे बखूबी निभाया है। हवा सिंह जब रिटायर हुए थे तब मैंने इस सेंटर की जिम्मेदारी संभाली थी। यह 1ी बात है। दो साल बाद यानी 1में अचानक राजेन्द्र सिंह यादव के निधन से मुझे बड़ा झटका लगा। इसके बाद हवा सिंह भी नहीं रहे। फिर मैंने सोचा अब इस सेंटर को मैंने उस मुकाम पर पहुंचाना है जिसका सपना मेर गुरु यादव जी और हवा सिंह ने देखा था। अपने गुरु के सपने का साकार करने के दौरान मुझे काफी दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा। माफिया टाइप लोगों ने मुझे काफी डराया-धमकाया। यहां तक कि मुझ पर भिवानी छोड़ने तक के लिए दबाव डाला गया। इतना ही नहीं मुझ पर मेर ही शिष्य की हत्या तक का आरोप लगाया गया। यहां तक कि मुझ पर विजिलेंस इंक्वायरी तक बिठाई गई। मैं पूरी तरह से निर्दोष साबित हुआ। मेर पास अपनी बेगुनाही के एक-एक डाक्यूमेंट हैं। मैंने बैंकों से लोन लिया, अपने खेत तक गिरवी रखे। लेकिन इस सेंटर पर आंच नहीं आने दी। इसमें मुझे साई के अधिकारियों का भी साथ मिला। मुझे राष्ट्रपति से आज जो सम्मान मिला है वह मेरी ईमानदारी, सच्चाई और लगन को दर्शाता है। इसके साथ ही विजेन्दर के ओलंपिक पदक ने मेरा सीना चौड़ा कर दिया है। द्रोणाचार्य अवार्ड और ओलंपिक पदक, सोने पे सुहागा जसा है। कहते हैं, यह पहला मौका है जब मैं अपने पूर परिवार के साथ किसी सार्वजनिक समारोह में जा रहा हूं। इससे पहले मैंने कभी अपने परिवार को तवज्जौ न देकर अपना पूरा ध्यान अपने बॉक्िसंग सेंटर पर लगाया।

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