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राजरंग

पोलटिक्स चीज ही ऐसी र भाई..ड्ढr फिर गलबहियां डाले दिखने लगे हैं दोनों यार। कुर्सी बदलने का किस्सा क्या शुरू हुआ, दोनों बंट गये थे। एक अपने गुरु के पास, एक हनी ब्रदर के पास। पोलटिक्स चीज ही ऐसी है र भाई। धूप में छांव और छांव में धूप दिखने-दिखाने लगता है। किसी ने पूछा कि अर ओ सांभा कितने लोग हैं? एक सुर से निकलता हनी भाई मिला कर कुल आठ। खाने के टेबुल पर साथ जीने- मरने की दुहाई देते थे। शुरू में तो शक किया जाता था कि दोनों यार एक दूसर के लिए ही काम कर रहे हैं। यहां की सूचना वहां और वहां की बात यहां। लेकिन दूरी बढ़ती ही गयी। लगा वाकई दोनों दो धार हो गये। एक कहे कि सब मान जायेंगे, दूजा बोले : घुटने टेकवा देंगे। लेकिन ई का, छोटका कद वाला जो अकड़ कर चलेला, कड़क कर बोलेला भरी दोपहरिये में पलटी मार दिया। इसके बाद तो रात होते-होते गुरु का जलवा ऐसा चला कि आठ में पांच पलट गये। बाकी दो अगले दिन सलट गये। कुछ बोलते ही नहीं बन रहा था। मुंह में रसगुल्ला जो ठुंसवा दिया। बड़का रफरी आये थे। रफरी साहब का जलवा गजब है। सो बन गयी सरकार। सरकार बनी, तो दोनों यार साथ हो गये..।

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