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बिहार बाढ़ : खाने के बिनाछूट जाएगी सांस

बिहार में बाढ़ से प्रभावित लाखों लोग मौत से जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। बाढ़ पीड़ितों को यहां पानी से साथ-साथ ‘भूख’ का भी मुकाबला करना पड़ रहा है। ऐसे वक्त में जब उन्हें सहारे की जरूरत है, ‘भूख’ पर बहस चल रही है। ‘भूख’ का सौदा किया जा रहा है। शायद इसी वक्त के लिए कहा गया है, ‘भूख पर होगी बहस, होती रहेगी उम्र भर, और सारी रोटियां कौवे उड़ा ले जाएंगे।’ बारह दिनों से लोग पानी में फंसे हैं। वे अब भी राहत के इंतजार में हैं। बड़े तो बड़े, कई बच्चों और बूढ़ों को भी पिछले छह दिनों से रोटी का एक टुकड़ा नसीब नहीं हुआ है, हालांकि मंत्री और अधिकारी पर्याप्त राहत कार्य किए जाने का दावा कर रहे हैं। सुपौल जिले में 60 वर्षीय राम किशुन ने रुंधे गले से बताया, ‘‘भैया छह दिनों से खाने का एक भी टुकड़ा नहीं मिला है। पानी से तो किसी तरह निकल आए हैं, यदि खाने को कुछ न मिला तो अब न रहा जाएगा!’’ एक राहत शिविर में सात वर्षीय बालक ने रोते हुए कहा, ‘‘पांच दिनों से कुछ खाए नहीं हैं। भूख बड़ी बहुत जोर से लगी है।’’ ऐसा नहीं कि बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्य नहीं चलाए जा रहे। जगह-जगह शिविर लगाए जाने की बात कही जा रही है। हेलीकाप्टर से खाने के पैकेट गिराए जा रहे हैं। अफसोस की बात यह है कि प्रभावित लोगों की तादाद के मुकाबले राहत कार्य ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ साबित हो रहा है। यहां जो राहत कार्य किए जा रहे हैं उन पर भी दबंग लोगों का प्रभाव है। जहां सेवा की भावना कम और पैसे बनाने की चिंता ज्यादा है। आलम यह है कि मौत को सामने देख रहे लोग सरकार और प्रशासन से जिंदगी की भीख मांग रहे हैं, लेकिन कुछ लोगों को यह अपनी छवि चमकाने और दूसरे हित साधने का माकूल अवसर नजर आ रहा है।

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