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उन्माद की राजनीति

उड़ीसा के बेहद गरीब और पिछड़े जिले कंधमाल में जिस तरह सांप्रदायिक हिंसा चल रही है, उससे यह पता चलता है कि यहां सांप्रदायिक विद्वेष कितना गहरा है। आदिवासी बहुल यह जिला ईसाइयों और कट्टरपंथी हिंदू संगठनों के बीच युद्धभूमि में तब्दील हो गया है और हाारों लोग अपनी जान बचाने के लिए आसपास के जंगलों में छिपे हैं। राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी तो बनती ही थी कि वह स्थिति को इस कदर विस्फोटक होने से बचाती ताकि पहले ही से गरीब आदिवासी और दलित परिवार हिंसा और आगजनी के शिकार न होने पाते। विश्व हिंदू परिषद के नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद राज्य सरकार को सचेत हो जाना चाहिए था कि इन इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा भड़क सकती है, लेकिन राज्य सरकार ने न जाने क्यों प्रतिहिंसा की प्रतिलहर को रोकने की कोशिश नहीं की। अभी संकेत तो यही मिल रहे हैं कि विहिप नेता की हत्या में ईसाइयों का हाथ नहीं है, संभव है यह काम राज्य में सक्रिय नक्सलियों ने किया हो, लेकिन प्रतिहिंसा का शिकार ईसाई ही बने हैं। इसके विरोध में देश भर में ईसाई शिक्षा संस्थाएं एक दिन बंद रहीं और इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया भी हुई है। जब भारत एक आधुनिक और परिपक्व लोकतंत्र की तरह विश्व मंच पर अपनी साख बना रहा है ऐसी घटनाएं हमार देश की छवि को खराब करती हैं। आखिरकार हर लोकतंत्र की कसौटी यही होती है कि वहां अल्पसंख्यकों के साथ कैसा सुलूक होता है, चाहे वे धार्मिक अल्पसंख्यक हों या वैचारिक। कंधमाल की हिंसा और विद्वेष का एक आर्थिक पक्ष भी है, जो नौकरियों में आरक्षण से संबंधित है। दलित ईसाई आरक्षण के पात्र नहीं होते, ईसाई संगठन उन्हें आरक्षण दिलवाना चाहते हैं और हिन्दू संगठन इसके खिलाफ हैं। ईसाई और हिन्दू संगठन यूं भी गरीबों को कुछ आर्थिक लाभ का लालच तो देते ही हैं। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि इस सांप्रदायिकता का सीधा संबंध गरीबी और पिछड़ेपन से है और इसका काफी हद तक इलाज विकास से किया जा सकता है। मुख्यमंत्री पटनायक की सरकार के खिलाफ विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव जरूर गिर गया, पर राज्य में व बाहर उनकी सरकार के खिलाफ जो अविश्वास पैदा हो गया है, वह विधानसभा के बहुमत से नहीं खत्म होगा, उसके लिए उन्हें अपनी सरकार की नेकनीयती का प्रमाण देना होगा।

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  • Web Title: उन्माद की राजनीति