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तमिलों को हक दिलाने को उठाने होंगे ठोस कदम

श्रीलंका में लिट्टे की कमर पूरी तरह तोड़ने जसी कामयाबी के बाद अब देश में शांति और स्थिरता के लिए श्रीलंका सरकार को तमिलों को उनके जायज अधिकार देने के बार मं गंभीर कदम उठाने होंगे। यदि एसा नहीं होता है तो श्रीलंका फिर जातीय हिंसा भड़केगी। जानकारों को उम्मीद है कि श्रीलंका सरकार इस बार में ठोस कदम उठाएगी। श्रीलंका में भारत के पूर्व उच्चायुक्त एन.एन.झा का कहना है कि मौजूदा महिन्दा राजपक्षे सरकार तमिल विरोधी जनता विमुक्ित पेरामुना के समर्थन से चल रही है। उम्मीद है कि लिट्टे से निपटने के बाद अब वहां जल्दी ही चुनाव होंगे। संभव है कि राजपक्षे की पार्टी श्रीलंका फ्रीडम पार्टी चुनावों के बाद बहुमत से सत्ता में आए और उसे जेवीपी के समर्थन की जरूरत न पड़े। तब राजपक्षे तमिल नेशनल अलायंस के साथ सत्ता में भागीदारी पर ठोस फैसला कर। झा का कहना है कि 1में हुए श्रीलंका समझौते के बाद के 13 वें संविधान संशोधन के तहत तामिलों के लिए स्वायत्तता तथा वितर्ना प्रस्ताव के तहत संघीय ढांचे में तमिलों की मांगों को पूरा किया जाना चाहिए। श्री झा भारत की अभी तक की भूमिका से संतुष्ट नहीं है। उनका कहना है कि भारत को श्रीलंका सरकार पर जसा दबाव बनाना चाहिए था, उसने नहीं बनाया। श्रीलंका में भारत के एक और उच्चायुक्त एसजेएस चटवाल का कहना है कि श्रीलंका सरकार को यह नहीं भूलना चाहिेए कि सैन्य उपायों से राजनीतिक विवादों को दूर नहीं किया जा सकता। श्रीलंका सेना कहीं बाहर विजयी नहीं हुई है, उसने अपनी ही जमीन पर जीत दर्ज की है। अब श्रीलंका सरकार का र्फा बनता है कि वह तमिलों की राजनीतिक समस्या का राजनीतिक समाधान भी दे। यदि तमिलों की समस्या नहीं सुलझाई जाती तो वहां गुरिल्ला युद्ध छिड़ेगा और भारी खून खराबे के कारण लाखों तमिल भारत में शरणाथी बनेंगे।

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