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बिहार बाढ़: एनजीआे व स्थानीय लोग सामने आए

बिहार में आई बाढ़ की त्रासदी झेल रहे लोग दूसरों के भरोसे जिंदगी जीने को विवश हैं। अब भी लाखों लोग बाढ़ के पानी से घिरे हैं। लाखों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया है, परंतु भोजन-पानी की समस्या भयानक रूप धारण कर चुकी है। भारतीय रेडक्रास सोसायटी के बिहार शाखा के प्रबंधक शहाबुद्दीन खां ने बताया कि पीड़ितों के लिए सोसायटी राहत पैकेट विभिन्न जिलों में भेज रही है। उन्होंने बताया कि यह कार्य रविवार से प्रारंभ कर दिया गया है। रविवार को सुपौल में 500 तथा सोमवार को सहरसा में 500 पैकेट भेजे गए। उन्होंने बताया कि एक पैकेट में एक-एक धोती, साड़ी, चादर, तौलिया, किचेन सेट, कंबल के साथ खाद्य सामग्री है। उन्होंने कहा कि राहत सामग्रियों को ट्रक से बाढ़ प्रभावित इलाकों में भेजा जाएगा। सोसायटी ने राहत सामग्री इकट्ठा करने के लिए राज्य के सभी जिलों में विशेष सेल खोले हैं। उधर, कई बाढ़ प्रभावित इलाकों के गांवों में लोग समाजसेवा करने निकल पड़े हैं। पूर्णिया के रूपौली गांव में ऐसे ही युवकों के एक दल ने मोर्चा संभाला है। दल के एक सदस्य रमेश बताते हैं कि वे सुबह बाढ़ से बचे क्षेत्रों में जाते हैं और घर-घर से एक दिन पहले के बचे हुए भोजनों को इकट्ठा कर प्रभावित इलाकों में भूख से बिलबिला रहे लोगों तक पहुंचाते हैं। उधर, सवयंसेवी संस्था भारत सेवा संघ सहित कई संस्थाएं प्रभावित जिलों में लोगों को भोजन कराने के कार्य में लगी हैं। संघ के अध्यक्ष रमाकांत पांडेय बताते हैं कि प्रतिदिन सैकड़ों लोगों को खाना खिलाया जा रहा है। बाढ़ पीड़ितों के लिए पटना महावीर मंदिर ट्रस्ट द्वारा पटना जंक्शन के नजदीक स्थित प्रसिद्ध महवीर मंदिर में खाने एवं चिकित्सा की व्यवस्था की गई है। महावीर मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष किशोर कुणाल ने बताया कि यह व्यवस्था अगले तीन माह तक चलेगी। उन्होंने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो बाढ़ पीड़ितों के रहने की भी व्यवस्था की जाएगी। बिहार राज्य पुल निर्माण निगम (लिमिटेड) ने बाढ़ पीड़ितों के लिए खाद्य सामग्री के 10 हजार पैकेट प्रभावित इलाकों में भेजे हैं। बिहार रिलीफ सेंटर नामक संगठन ने सोमवार से राजधानी के अजय भवन में बाढ़ राहत केंद्र खोला है। सुपौल के बाढ़ प्रभावित कर्नपुरा, सुखपुर, परसरमा आदि गांवों में युवकों द्वारा ही राहत सामग्रियां जुटायी जा रही हैं तथा उसे बाढ़ प्रभावित इलाकों में बांटी जा रही है। बताया जाता है कि कई बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय निवासियों द्वारा ही राहत कैंप चलाए जा रहे हैं।

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