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शांति की खातिर

लगातार दो महीने तक आंदोलन की गर्मी को बरकरार रखने के बाद जम्मू अब शांत है। संघर्ष समिति ने भले ही अमरनाथ के तीर्थयात्रियों के लिए कश्मीर में जमीन के प्रावधान और उसे वापस लिए जाने के खिलाफ अपना आंदोलन वापस न लिया हो, लेकिन उसे विराम दे दिया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि पिछले आठ हफ्तों में पूर देश को जो तनाव मिला था, वह अब ठंडा पड़ जाएगा। उम्मीद इसलिए भी बनी है कि राज्य के तकरीबन सभी प्रमुख राजनैतिक दलों ने इस समझौते का स्वागत किया है। इसका अकेला अपवाद मुफ्ती मुहम्मद सइद की पार्टी पीडीपी ही है, और यह अपवाद ही अमन के सिर चढ़ने की उम्मीदों पर शक पैदा करता है। यह पीडीपी ही थी जिसकी सरकार ने श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने का प्रावधान किया था। यह पीडीपी ही थी जिसने इस प्रावधान के विरोध में कांग्रेस की सरकार से समर्थन वापस लेकर असल विवाद को खड़ा किया था। विवाद जम्मू से सर उठाकर घाटी तक पहुंचा तो यही पीडीपी हुर्रियत कांफ्रेंस जसी अलगाववादी ताकतों के साथ खड़ी दिखाई दी। जम्मू में शांति हो भी जाती है तो भी हुर्रियत और पीडीपी जसे लोग कश्मीर घाटी में इसे शांत नहीं होने देंगे। यह ठीक है कि जम्मू के शांत हो जाने के साथ ही कश्मीर की अर्थिक नाकेबंदी के तर्क अब बेमलब हो गए हैं। लेकिन इस बीच अलगाववाद की जो आग घाटी में भड़काई गई वह ठंडा होने में समय लेगी। हमारी धारणा यह है कि इस आग को एक अच्छी राजनीति और समग्र विकास से ही शांत किया जा सकता है। लोकतंत्र की राजनीति और विकास अगर मुख्यधारा बन जाएं तो अलगाववाद दरकिनार हो जाता है। लेकिन यह प्रक्रिया लंबी है और इसके लिए उससे भी लंबे धीरा की जरूरत होती है। मौके बेमौके हुई भूल-चूक को अगर छोड़ दें तो कश्मीर में इस प्रक्रिया को हमने बरसों बरस चलाया भी है। अभी महा दो महीने पहले तक यह लग रहा कि बाजी अलगाववादियों के हाथ से निकल चुकी है। लेकिन राजनैतिक दलों की आपसी खींचतान ने बेवजह मुद्दों को जिस तरह से हवा दी उससे अलगाववादी फिर से जनमानस पर हावी होते दिखाई दिए। इस जनमानस को जीतने के लिए दो महीने पहले छूट गए सिलसिले को फिर से शुरू करके आगे बढ़ाना होगा। जम्मू में हुए समझौते को बस एक शुरुआत भर माना जाए, अभी हमें बहुत आगे जाना है।

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  • Web Title: शांति की खातिर