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विश्व के सामने चुनौती

वक्त की खूबी है कहावत है कि ‘वह दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था’। बीजिंग ओलंपिक में अभिनव बिन्द्रा, सुशील कुमार, विजेन्द्र कुमार की ऐतिहासिक सफलताओं के दौर में, भारत का ध्यान क्रिकेट से हट एथलेटिक्स की ओर भी गया है। देहातों में दिवाली मनाई गई। माताओं के चेहर पर ममतामय खुशी, गुरुओं से किए वायदे को निभाया गया। मध्यमवर्ग का जीवन, झूम उठा देश, अपार इच्छाशक्ित का भंडार, खेलों में नए युग का आगमन। लगता है भारतीय एक ही खेल को देखकर अन्य खेलों में भी आनंद की प्राप्ति चाहते हैं। राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली महंगी होती उच्च शिक्षा दिनांक 15 अगस्त के हिन्दुस्तान में श्री एन. के. सिंह का लेख ‘वायदों से आगे की जमीन और आसमान’ पढ़ा। भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं की अगर तुलना की जाए तो जनतांत्रिक ढांचा साम्यवादी ढांचे से कमजोर दिखता है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि मानव स्वतंत्रता को हमार राजनैतिक ढांचे में उच्च महत्व दिया गया है। लेखक का मानना सही है कि इसके फायदे को वित्तीय लाभ की तराजू में तोला नहीं जा सकता। मुख्य चिंता का विषय तो बेरोगार युवाओं की वह फौा है जो हर साल विश्वविद्यालयों से निकलती है। सरकार इसके लिए उचित रोगार के अवसर जुटाने में असमर्थ रही है। साथ ही उच्च शिक्षा महंगी होती जा रही है। हंस कुमार चानना, द्वारका, नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट को भी धता सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आदेश हुआ कि युनिवर्सिटी के चुनावों में चुनाव आचार संहिता का सख्ती से पालन हो। यदि यहां से ही कानून का पालन सही किया एवं कराया जाए तो अन्य कारपोरशन, विधानसभा एवं लोकसभा में भी सख्ती बरती जा सकेगी, मगर कानून की मजाक उड़ाकर विद्यार्थियों ने दिखा दिया कि हमार देश की बड़ी से बड़ी कोर्ट भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। अशोक गुप्ता दाड़ीवाला, इन्द्रलोक, दिल्ली जाम ही जाम हाय राम!ड्ढr हर तरफ जाम ही जामड्ढr कितना हो चुका नुकसानड्ढr चारों तरफड्ढr मचा कोहरामड्ढr सरकार कर नहीं रही यह कामड्ढr इसलिए हो रही बदनाम वेद, मामूरपुर, नरला, दिल्ली

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