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class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

ानसाधारण एक्सप्रेस के दस घंटे लेट खुलने से राजेंद्रनगर टर्मिनल पर सैकड़ों बाढ़ पीड़ितों की मंगलवार की रात प्लेटफॉर्म पर ही बीती। दिल्ली जाने के लिए टर्मिनल पर सुबह से पीड़ितों का जमावड़ा शुरू हो गया था। शाम 4.20 बजे खुलने वाली 2387 जनसाधारण एक्सप्रेस रात दो बजे राजेंद्रनगर से खुली। छोटे-छोटे बच्चों को लेकर बाढ़ पीड़ित प्लेटफॉर्म पर ही सो गए। प्लेटफॉर्म पर पैर रखने तक की जगह नहीं बची थी। दस दिनों से बेघर हुए लोग प्लेटफॉर्म पर भी सुकून महसूस कर रहे थे।ड्ढr ड्ढr रलवे व समाजसेवियों की ओर से पीड़ितों के लिए भोजन, पानी व स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था होने से काफी राहत मिली। कई लोग तो टर्मिनल पर ही अपना आशियाना बना चुके हैं। सुपौल के छातापुर की निवासी मालती देवी अपने पति व बच्चे के साथ दो दिनों से टर्मिनल पर रह रही हैं। उन्होंेने बताया कि गांव से पानी निकलने तक वे यहीं रहना चाहती हैं। रल अधिकारी ने बताया कि दिल्ली से डाउन जनसाधारण एक्सप्रेस 11 घंटे लेट से आई थी, जिस कारण वापसी में भी विलंब हुई।ड्ढr उधर आरा-बक्सर रलखंड के कारासात स्टेशन पर ट्रेन के ठहराव की मांग को लेकर लोगों ने ट्रेन परिचलान सुबह 7.50 से दस बजे तक बाधित रखा। इस कारण 23श्रमजीवी एक्सप्रेस पांच घंटे, 22संघमित्रा एक्सप्रेस चार घंटे, 3202 कुर्ला एक्सप्रेस पांच घंटे, 560 सवारी गाड़ी चार घंटे समेत कई ट्रेन डाउन में घंटों लेट से पटना जंक्शन पहुंचीं। प्लेटफॉर्म पर ही रखा रोा व मनाई तीजड्ढr ब्रजेश कुमार पटनाड्ढr आशियाना उाड़ गया है। भूख से अंतड़ी सूख गई है। पर आस्था के सामने ये सब मायने नहीं रखते। राजेंद्रनगर टर्मिनल व पटना जंक्शन पर बड़ी संख्या में बाढ़ पीड़ितों ने मंगलवार को रोा रखा और महिलाओं ने पति की सलामती के लिए तीज पर्व पर निर्जला रहीं।ड्ढr सुपौल जिले के कटही की रहने वाली गीता देवी ने बताया कि तीज पर्व कैसे छोड़ सकती हूं। तीज के दिन र्निाला रहने की प्रथा पुरखों से चली आ रही है। दो दिनों से राजेंद्रनगर टर्मिनल पर रुकी हुई हूं। चूड़ा-गुड़ खाने को मिल रहा है। इससे पहले एक सप्ताह तक यह भी नहीं मिल रहा था। उन्हें इसका मलाल जरूर है कि तीज के दिन भगवान की पूजा अर्चना नहीं कर पाईं। मधेपुरा के मुरलीगंज निवासी रणु देवी ने कहा कि दस दिन पहले से गांव छोड़कर परिवार के साथ भटक रही हूं। पति ने तीज पर्व करने से मना किया। इसके बावजूद मैने तीज किया, क्योंकि भगवान ने हमलोगों की जान बचाई है। दुख की घड़ी में भगवान को कैसे भूल जाऊं। मधेपुरा के गोसाईंटोला के मो. असलम ने पूर परिवार के साथ प्लेटफॉर्म पर रोा किया और शाम में चूड़ा-गुड़ से इफ्तार किया। उन्होंने कहा कि ऐसे भी दस दिनों से भूखे रहने की आदत हो गई है। अब तो एक माह तक रोा रखना है। अररिया के जोकीहाट निवासी मो. सलाउद्दीन अपनी मां, पत्नी व बच्चे को गांव के मदरसे में छोड़कर दिल्ली जा रहे हैं। उन्होंने भी प्लेटफॉर्म पर शाम में चूड़ा-गुड़ से ही रोा तोड़ा।

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