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कोस-कोस भर पानी

ऐसी बाढ़ और इत्ती बरसात! फ्लड ने ब्लड सुखा रखा है। मानसून ने पतलून ढीली कर रखी है। पानी की कमी का रोना रोने वाले मुंह छिपाए पड़े हैं। लखनऊ में गोमती मैया ने परेशान किया था, तो मैं इधर बिहार में अपने गांव आ गया था। यहां से रांची भागना पड़ा है। रेल मार्ग से आया था, जल मार्ग से लौटा हूं। वायु मार्ग से इसलिए संभव नहीं हो सका, क्योंकि यह सिर्फ उन लोगों के नसीब में है जो ऊपर-ऊपर से जायजा लेते हैं, यह देखते हैं कि कौन कितने पानी में हैं? बिहार में पहले एक जिल का ही नाम बाढ़ था। आज कम स कम पंद्रह जिलों का नाम बाढ़ रख देने लायक हो गया है। सर्वत्र जल प्रलय। पानी ही पानी। दूध की कीमत डेढ़ सौ रुपए लीटर। अन्न की कीमतों का पता नहीं। जो चीज हो ही नहीं, उसकी कीमत की बात भी बेकार है। कहां गए आपदा प्रबंधन वाले, विकास के बड़े-बड़े बांध बांधने वाले, सुविधाओं की नदी में व्यवस्था की मोटरबोट से सैर करने वाले? शर्म के मारे नहीं, बाढ़ के मारे डूब मरन का मन होता है। कोसी को कोसा जाए कि अपनी किस्मत को! अब हाथ भर नहीं, कोस-कोस गहरा पानी है। बीजिंग ओलंपिक में चाहे कितने ही नए रिकार्ड बने हों, इधर अपने इलाके में बाढ़ और बारिश नया रिकार्ड बनाने पर आमादा हैं। संपर्क मार्ग ईमानदारी की तरह लापता हैं। बेमेल गठबंधन समान ताल, तलैया, पोखर, कुएं, गड्ढा, गड़ही सब एक हो चुके हैं। कच्ची दीवारें मुशर्रफ हो रही हैं। राजनीतिक समुदाय के जीवों के चरित्र की मानिंद नावें पलट रही हैं। नेचर के अदृश्य बिग बॉस ने पब्लिक को उन्हीं के घरों में, छतों पर, पेड़ों पर नजरबंद कर रखा है। बूंदों की झड़ियां एकता कपूर के धारावाहिकों जैसा ठहरन का नाम ही नहीं ले रहीं। जलस्तर महंगाई के सूचकांक की तरह घट-बढ़ रहा है। बादल फटे पड़े हैं। घटाएं डराने लग गई हैं। बिजलियों के कैमरे चमक रहे हैं। लगता है, मेघ भी गुप्त सीडी बना रहे हैं। कहीं ऊपर बैठे इंद्र महाराज ने स्टिंग वाला धंधा तो नहीं चालू कर दिया? मौके का लाभ उठाकर वे भी अपना नया चैनल लांच करने वाले हैं क्या? पानी का बढ़ना और उतरना, दोनों ही बुरा है। कल को यह बाढ़ लौटेगी तो इधर तमाम बीमारियां अपने दफ्तर खालकर बैठ जाएंगी। उधर बाढ़ राहत के नाम पर सैकड़ों फर्जीबाड़े खुलेंगे। बिहार के बाढ़पीड़ितों की किस्मत में बाढ़ की वापसी के बाद भी अभी ढेर सारा पानी फिरना बाकी है।

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