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बचपन : ताकि खेलने की उम्र में वे मां न बनें

बाल विवाह अपराध तो है ही, इसका बच्चियों और किशोरियों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। इस उम्र में तो इन्हें सेक्स व प्रजनन संबंधी जानकारी भी नहीं होती है। छोटी उम्र में शादी और जल्दी संतान हो जाने पर मातृ और बाल मृत्यु दर बढ़ती जाती है और विवाहित किशोरियों को अनेक बीमारियों का खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। विवाहित किशोरियों को सेक्स और प्रजनन संबंधी जानकारी न होने से अनेक बीमारियों और प्रसव बाद की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। दुख की बात यह है कि भारत में सबसे ज्यादा उपेक्षित वर्ग (15-1साल) यही है। उनके लिए कोई राष्ट्रीय नीति तक नहीं है। यहां तक कि नेशनल यूथ पालिसी, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन तथा रिप्रोडक्िटव एंड चाइल्ड हेल्थ कक में भी सामाजिक रूढ़ियों के कारण शीघ्र विवाह की चपेट में आने वाली किशोरियों का जिक्र तक नहीं है। इंस्टीट्यूट फार हेल्थ मैनेजमेंट, पाचौड़ नामक गैर सरकारी संगठन ने महाराष्ट्र के उन गांवों और शहर में जहां कम आयु की बच्चियों के विवाह सबसे ज्यादा होते हैं, साथी (सेफ एडोलसेंट ट्रांजिशन एंड हेल्थ इनिशिएटिव) नामक एक प्रोग्राम शुरू किया। तीन साल तक चले इस कार्यक्रम के सकारात्मक परिणामों से प्रभावित होकर अब स्वास्थ्य मंत्रालय इसे आगे बढ़ाने का इच्छुक है। इस कार्यक्रम ने वहां विवाह की आयु और पहले बच्चे के जन्म की मियाद बढ़ा दी है जिससे कम वजन के बच्चों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आई है। इस कार्यक्रम से यह बात भी सामने आई कि अगर विवाहित किशोरियों को स्वास्थ्य, सेक्स और प्रजनन संबंधी जानकारी उपलब्ध हो तो मातृ मृत्यु दर और प्रसव बाद की समस्याओं से बचा जा सकता है। इतना ही नहीं इससे उनके व्यक्ितत्व, व्यवहार तथा घरलू जीवन में भी उल्लेखनीय बदलाव लाया जा सकता है। संगठन ने औरंगाबाद जिले में पाचौड़ और उसके आसपास के 50 गांवों तथा पूना की 27 झुग्गी बस्तियों में 2003 से 2006 तक अपना प्रोग्राम चलाया। गांव विकास समिति ने सहयोग दिया और एसी किशोरियों की निशानदेही की जो थोड़ी पढ़ी-लिखी थीं और घर-घर जाकर अपनी बात समझा सकती थीं। इन लड़कियों के घर वालों को साथी कार्यक्रम से जुड़ने पर एतराज नहीं था। ये किशोरियां अपनी हमउम्र लड़कियों और उनके परिवार वालों को समझातीं कि जल्दी शादी और पहला बच्चा जल्दी होने के क्या नुकसान हैं। किशोरियों को अलग-अलग ग्रुप में बुलाकर गांव विकास समिति के माध्यम से भी समझाया जाता था। इस कार्यक्रम से पूर इलाके में भारी बदलाव आया। जहां पहले 15 साल से कम उम्र की लड़कियों का विवाह हो जाता था, अब विवाह की आयु 16-17 साल तक हो गई है। इसी तरह जहां पहले बच्चे का जन्म 15-16 साल की उम्र में हो जाता था अब 17-18 साल की आयु से पहले नहीं होता। पहले ग्रामीण क्षेत्रों में 35 प्रतिशत तक बच्चे कम वजन के पैदा होते थे जो घटकर 25 प्रतिशत पर आ गए हैं। शहरी क्षेत्रों में यह संख्या 27.5 प्रतिशत से कम होकर 18.8 प्रतिशत रह गई है। इंस्टीट्यूट फार हेल्थ मैनेजमेंट के अनुसार कार्यक्रम की सफलता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि पूर इलाके में प्रसव पूर्व और बाद की समस्याओं तथा प्रसव संबंधी बीमारियों में कमी आई है। साथ ही गर्भनिरोधकों की मांग बढ़ी है। ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी मांग 10.प्रतिशत से बढ़कर 23 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 8 प्रतिशत से बढ़कर 30 प्रतिशत हो गई है। महाराष्ट्र में इन लड़कियों के जीवन में किस तरह परिवर्तन आया उसका एक उदाहरण है अंजना काए। आठवीं पास अंजना के पिता 13 साल की उम्र में उसकी शादी करना चाहते थे। वह तीन साल तक अपने पिता को रोकने में कामयाब रही क्योंकि वह जान चुकी थी कि छोटी उम्र में शादी करने और जल्दी संतान हो जाने का किशोरियों को क्या खामियाजा भुगतना पड़ता है। बच्चे भी कम वजन के और कुपोषण के शिकार होते हैं। अंजना ने जल्दी विवाह कर अपना जीवन नरक न बनाने का फैसला किया। उचित आयु में उसने विवाह किया और शादी के तीन साल बाद पहले बच्चे को जन्म दिया। आज वह और बच्चा दोनों स्वस्थ और सुखी हैं। अब अंजना अपनी बस्ती में लायब्रेरी (सूचना केंद्र) चलाती है। सोमवार और बुधवार को वहां लड़कियां आती हैं और वह उन्हें स्वास्थ्य व प्रजनन संबंधी जानकारी देती है। सरकार यदि मातृ मृत्यु दर और बाल मृत्यु दर में कमी लाना चाहती है तो उसे 15-1साल के आयु वर्ग की ओर ध्यान देना होगा। महाराष्ट्र की सफलता से सबक सीखे जा सकते हैं। लेखिका हिन्दुस्तान से जुड़ी हैं।

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