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पड्डूचेरी: विकास लाने वाले मुख्यमंत्री की विदाई

पड्डूचेरी में मुख्यमंत्री एन. रंगासामी की जगह वी. वैद्यलिंगम ने ले ली। यह घटना फिर उसी कहानी को दोहराती है किड्ढr राजनीति का विकास से कोई रिश्ता नहीं है। इस छोटे से केंद्र शासित प्रदेश के दो जिले तमिलनाडु के साथ लगते हैं, जबकि एक आंध्र से और एक केरल से। 2007-08 में औद्योगिक विकास और कल्याण कार्यक्रमों के मामले में इसे छोटे राज्यों में सबसे अच्छा राज्य घोषित किया गया था। जबकि इसके पहले इसका नंबर इस फेहरिस्त में चौथा था। लेकिन इस बार यह दिल्ली और गोवा को लांघता हुआ पहले नंबर पर जा पहुंचा। जाहिर है कि इसके बाद तो किसी भी मुख्यमंत्री को मंत्रिमंडल के अपने सहयोगियों और अपनी पार्टी में काफी लोकप्रिय होना चाहिए, जनता को तो खर ऐसे मुख्यमंत्री को सर आंखों पर बिठाना ही चाहिए। लेकिन मामला ऐसा नहीं है। इस खूबसूरत जगह में खासी उथल-पुथल चल रही है। मंत्रिमंडल के आधे से ज्यादा सदस्यों ने अपने नेता के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया हुआ था। हालत यहां तक पहुंच गई थी कि वे अपने मंत्रिमंडल की बैठक तक बुला नहीं सकते थे। वे जब मंत्रिमंडल की बैठक का निमंत्रण भेजते तो बागी मंत्री उसमें आते ही नहीं थे। नतीजा यह हुआ कि प्रशासन भी लगभग ठप्प पड़ गया। एक साल से हालात ऐसे ही थे, इसलिए राज्य का बजट जिस तरह से पेश हुआ वह भी एक मजाक बनकर ही रह गया। चर्चा यह भी रही कि जिस दिन बजट पेश किया जाना था उसकी पहली रात को ही बजट तैयार हुआ, ताकि इस संवैधानिक औपचारिकता को निपटाया जा सके। मुख्यमंत्री बजट प्रस्तावों पर चर्चा के लिए मंत्रिमंडल की एक भी बैठक नहीं कर सके। रंगासामी ने भी सत्ता में बने रहने के लिए सब कुछ किया। वे दिल्ली गए, सोनिया गांधी और अन्य पार्टी नेताओं से मिले। इससे उन्हें कुछ वक्त तो जरूर मिल गया लेकिन वे आखिर कब तक खर मनाते। कांग्रेस आला कमान कब तक इस बात की अनदेखी कर सकती थी कि मुख्यमंत्री के पास विधायक दल के दस में से सिर्फ दो ही विधायकों का समर्थन है। उन्हें विधायक दल की बैठक बुलाने और बहुमत साबित करने के लिए कहा गया। बैठक के दौरान दोनों गुटों के समर्थकों ने काफी बवाल किया और सार्वजनिक परिवहन को नुकसान पहुंचाया। पिछले एक साल से पड्डूचेरी कांग्रेस में विरोध दर्ज कराने के लिए यही तरीका अपनाया जाता रहा है। इस बवाल ने उस समय जोर पकड़ा था जब केंद्र के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और केंद्रीय मंत्री वी नारायणसामी ने राज्य के मुख्य सचिव को चिट्ठी लिखकर राज्य के दूसर विधानसभा क्षेत्रों में चल रहे विकास कार्यो की तुलना में मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में चल रहे विकास कार्यों का ब्योरा मांगा। इसके विरोध में नारायणसामी की कार को तोड़ डाला गया, जगह-ागह उनके पुतले जलाए गए। मुख्यमंत्री रंगासामी तत्ताचावडे से विधानसभा चुनाव जीते थे और सबसे ज्यादा परियोजनाएं व सरकारी खजाने का हिस्सा इसी क्षेत्र में गया। अपनी छवि के कारण ही उन्होंने अप्रैल 2006 में फिर से मुख्यमंत्री बना दिया गया, बावजूद इसके कि इसे लेकर विधायक दल में काफी विरोध भी था। वे इसलिए भी चुन लिए गए थे कि उनके विरोधी किसी एक नाम पर एकमत नहीं हो सके थे। जाहिर है कि असंतोष पहले दिन से ही वहां था। बाकी कसर रंगासामी ने अपने अलावा बाकी निर्वाचन क्षेत्रों के साथ भेदभाव करके पूरी कर दी। द्रमुक के सात विधायक कांग्रेस को समर्थन दे रहे थे, शायद तमिलनाडु में द्रमुक सरकार को मिल रहे कांग्रेस समर्थन के जवाब में। विपक्ष में बैठी अन्ना द्रमुक कांग्रेस का विरोध कर रही थी। उसका मुख्यमंत्री पर आरोप है कि उन्होंने जनता के पैसे के करोड़ों रुपए बार-बार दिल्ली की यात्रा करके बर्बाद कर दिए। वह भी सिर्फ इसलिए कि उनकी कुर्सी सलामत रहे। हालांकि द्रमुक सरकार के मतभेदों को कांग्रेस का अंदरुनी मामला ही बताती रही, लेकिन सच यही है कि वह भी रंगासामी की विदाई का ही समर्थन कर रही थी। इस पूर विवाद को देखकर यह नहीं लगता कि नए मुख्यमंत्री वैद्यलिंगम राज्य के समीकरणों मे कोई बड़ा बदलाव ला पाएंगे। वे नेत्तापक्कम निर्वाचन क्षेत्र से लगातार छठी बार चुनाव जीते हैं और इसके पहले पांच साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। पार्टी के भीतर उनकी लोकप्रियता भी रंगासामी जसी ही है। अब कांग्रेस को डर है कि रंगासामी या तो अपनी क्षेत्रीय पार्टी बना सकते हैं या फिर पड्डूचेरी मुन्नेत्र कषघम में शामिल हो सकते हैं। इस पार्टी को भी कांग्रेस के बागियों ने ही बनाया है।ं

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