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दो टूक

देश की शिक्षा-प्रणाली की तमाम गिरावट के बावजूद आज भी हमें हर योग्य और अपने क्षेत्र में सफल व्यक्ित के निर्माण के पीछे कहीं न कहीं एक सुयोग्य शिक्षक खड़ा दिखाई देगा। शिक्षक किसी भी शिक्षा अभियान का केंद्र और उसकी न्यूनतम जरूरत होता है। स्कूल बिना इमारत और कुर्सी-मेज जसे साधनों के चलाए जा सकते हैं, पर बिना टीचर के नहीं। ऐसे कई उदाहरण हैं, जहॉं एक योग्य और समर्पित टीचर ने बिना किसी स्वार्थ के फर्नीचर और इमारत के बगैर भी गरीब बच्चों को शिक्षित बनाया है। 5 सितंबर को अध्यापक-दिवस मनाते हुए हमें यह बुनियादी बातें ध्यान में रखनी चाहिएं। साथ में हमें यह सवाल भी पूछना चाहिए, कि हमार राज-समाज में अपने केंद्रीय महत्व के बावजूद एक बुनियादी शिक्षक आज भी इतनी अवहेलना का पात्र क्यों है? स्कूली व्यवस्था का यह आधार जब तक मजबूत नहीं होगा, तब तक अरबों रुपए खर्च करने पर भी शिक्षा प्रणाली में जरूरी बदलाव लाना कठिन होगा। उससे जो बच्चे गुजरंगे, वे साक्षर भले हों, सही मायनों में शिक्षा के संस्कारों से लैस नहीं होंगे। हिन्दुस्तान आज शिक्षक दिवस पर ऐसे प्रतिबद्ध गुरुानों की श्रृंखला को प्रणाम करता है, जिनके पारस स्पर्श ने हमें तमाम दिक्कतों के बावजूद देश में कई सार्थक और व्यापक बदलाव लाने वाले नागरिक दिए हैं।

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