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गुरु की आज्ञा सिर माथे रखते थे बिरला जी

दिवंगत कृष्ण कुमार बिरला दयानिधान के रूप में जाने जाते थे। लेकिन वे अपने गुरु का किस तरह सम्मान करते थे इसके बार में आम लोगों को जानकारी नहीं। बिरलाजी दिल्ली के जानेमाने हिन्दू कालेज के छात्र थे। उन्होंने भौतिक शास्त्र पढ़ाने वाले स्व.प्रो.ए.एन.पुरी को बहुत प्रभावित किया।कालेज से रिटायर होने के कोई 25-30 साल बाद खुद एक बार प्रोफेसर पुरी की उनसे मिलने की इच्छा हुई। तब तक कृष्ण कुमार बिरला कामयाबी के कीर्तिमान कायम कर रहे थे। प्रो. पुरी ने उन्हें एक पत्र लिखा। पत्र का उत्तर उन्होंने झटपट भेज दिया और आने का आग्रह किया। प्रो. पुरी उनके तीस जनवरी मार्ग स्थित बिरला हाउस पहुंचे तो कृष्ण कुमार बिरला ने खुद उठ कर उनका उसी तरह स्वागत किया जसा कि भारत की गुरु-शिष्य परंपरा में शिष्य को करना चाहिए।ड्ढr ड्ढr नौकर चाय लेकर आया तो उन्होंने नौकर को हटा दिया, बोले कि ये मेर गुरु रहे हैं, मैं इनकी चाय खुद बनाऊंगा। स्व. पुरी अक्सर यह संस्मरण लोगों को सुनाया करते थे। कहते कि एक ओर उनका आचरण और दूसरी ओर आज एसा जमाना कि छात्र शिक्षकों की कतई इज्जत नहीं करना चाहते।ड्ढr वे अक्सर बताते थे कि किस तरह बिरला जी को इतने सालों के बाद भी उनकी याद रही। कृष्ण कुमार बिरला खुद उन्हें दरवाजे तक विदा करने आए और अपनी निजी गाड़ी में बिठा उन्हें घर भेजा। उनसे यह भी पूछा कि रिटायर हो जाने के बाद उन्हें किसी किस्म की आर्थिक परशानी तो नहीं।ड्ढr कृष्ण कुमार बिरला वक्त के बहुत पाबंद थे। वर्ष 1में एक बार फिर बिरलाजी से प्रो. पुरी मिले और उन्हें सरदार पटेल स्थित अपने निवास पर आने का निमंत्रण दिया। प्रो. पुरी को लगा कि उन्होंने नौ बजे आने को कहा है। नौ से ऊपर का समय होने लगा, तो प्रोफेसर निराश हो गये, परिवार वालों से कहा कि अब वे नहीं आएंगे। शायद भूल गए हैं या कोई जरूरी काम आ पड़ा होगा।ड्ढr लेकिन ठीक साढ़े नौ बजे उनके फ्लैट की घंटी बजी और सामने बिरला जी खड़े थे। प्रो. पुरी ने कहा कि आपको आने में देर हो गई तो हमने सोचा कि अब आप नहीं आएंगे। इस पर बिरला जी ने कहा कि मैं आपका शिष्य रहा हूं, मैं देर से कैसे आ सकता हूं, बिलकुल सही समय पर आया हूं और उन्होंने पीए से डायरी दिखाने को कहा जिसमें आने का समय साढ़े नौै बजे लिखा था।

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