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अपराध पर राजनीति

संगठित अपराध को रोकने के लिए विशेष कानून बनाने और उसके इस्तेमाल की क्षाजत महाराष्ट्र को बरसों पहले मिल गई थी। इसके बाद बाकी राज्यों ने भी इसी तर्क पर कानून बनाने की कोशिश की। गुजरात के मुख्यमंत्री नरंद्र मोदी न जाने कबसे यह बार-बार पूछते रहे हैं कि अगर महाराष्ट्र में बनाए गए ऐसे कानून को केंद्र की क्षाजत मिल सकती है तो गुजरात को क्यों नहीं ? हर बार जब गुजरात में कोई अनहोनी होती है तो मोदी इस बयान को दोहरा देते हैं और पूरी भारतीय जनता पार्टी उनके सुर में सुर मिला देती है। लेकिन यही सवाल अब दूसर और तनिक और रचनात्मक ढंग से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने उठाया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने महाराष्ट्र की ही तर्ज पर यूपीकोका नाम का कानून बनाया था और यह कानून तब से केंद्र के पास क्षाजत के लिए पड़ा है। केंद्र ने क्षाजत नहीं दी तो मायावती ने बजाय बयान देने के इस काूनन को ही वापस ले लिया। वैसे भी केंद्र की क्षाजत के बिना इस कानून के होने या न होने का केाई अर्थ नहीं था। यूपीकोका कानून को वापस लेते समय मायावती ने दो बाते कहीं और वे दोनों ही खासी महत्वपूर्ण हैं। एक तो यह कि केंद्र के दोहर मानदंड के कारण इसे वापस लिया जा रहा है और दूसर उत्तर प्रदेश को अब ऐसे कानून की कोई जरूरत ही नहीं है। उन्होंने उदाहरण भी दिया कि इस कानून के बिना ही लोगों को ददुआ और ठोकिया जसे अपराधियों से मुक्ित दिला दी गई। उत्तर प्रदेश सरकार अगर बिना विशेष कानून के ही अपराध पर नियंत्रण पाने का आत्मविश्वास रखती है तो यह अच्छी बात है। ऐसे विशेष कानून कारगर होने के लिए कम जाने जाते रहे हैं और अपने दुरुपयोग के लिए ज्यादा। इन कानूनों की ओर से प्राय: नागरिक अधिकारों का हनन भी होता रहा है। लेकिन फिलहाल ये मसले ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं, महत्वपूर्ण राज्यों के बीच होने वाला भेदभाव है। पिछले कुछ साल में जिस तरह से अपराध और आतंकवाद ने नए रूप और रुख अपनाएं हैं उसे देखते हुए एक व्यापक नीति की जरूरत है। हमें यह देखना चाहिए कि मौजूदा कानून कितने कारगर हैं और उनमें किन संशोधनों की जरूरत है। और क्या विशेष कानून वाकई जरूरी हैं। अलग-अलग राज्यों के बीच फर्क करने के बजाय इस पर एक व्यापक राष्ट्रीय नीति और सर्वानुमति बननी चाहिए।

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