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यह तो बैंक ऑफ सुधाकर बन गया था

मानो एसबीआई नहीं बल्कि प्राइवेट बैंक ऑफ सुधाकर त्रिपाठी। सिद्धार्थनगर में एसबीआई की डुमरियागां शाखा का हाल कुछ ऐसा ही था। सरकारी छुट्टी हो या रात के बारह बो हों.. कैशियर सुधाकर त्रिपाठी किसी भी वक्त बैंक खोलकर लोगों को लाखों रुपया मुहैया करा देता था। यह खुलासा रमेश कुमार मौर्या ने किया। चाय की कैंटीन चलाने वाला रमेश हकीकत में बैंक के लिए अवैध कैशकुली का काम कर रहा था। सीबीआई के हाथ मेंोाने से पूर्व ही एंटी करप्शन ऑर्गनाक्षेशन (एसीओ) इस प्रकरण को पूरी तरह खोल देने की तैयारी में है।ड्ढr एसीओ की टीम ने बैंक के लेखाधिकारी राराम और रमेश को ोल ो दिया है। नामाद अभियुक्तों से बरामद 20 लाख रुपए की नकली करंसीोाँच के लिए नासिक ोीोा रही है। रमेश ने माना है कि बैंक में नकली नोटों का धँधा 2007 से चल रहा था। बाहर से आने वाले नकली नोटों को वही चेस्ट में रखता था। बैंक के अधिकृत कैशकुली को इससे अलग रखा गया था।ड्ढr इस मामले में बर्खास्त डुमरियागंज के एसओ और बैंक प्रबंधक पर शिकंजा कस चुका है। सुधाकर के मकान मालिक दिलीप श्रीवास्तव की भी पड़ताल हो रही है। वैसे तो वह चतुर्थ श्रेणी कर्मी है पर चलता बोलेरो से है। उसके दोनों बच्चे लखनऊ के एक कान्वेंट में पढ़ते हैं। कोर्ट ने सुधाकर व आबिद का नारको व पॉलीग्राफिक परीक्षण कराने की अनुमति दे दी है। एसीओ के एडीाी रामलाल राम का कहना है कि वह अपराधियों के करीब पहुँच चुके हैं।

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